नई शुरुआत

“रात के 1:00 बजे स्टेशन पर बैठे रोहित ने सोचा भी ना था, वो इस तरह आएगी और उसकी ज़िंदगी में सब बदल जाएगा… उस पगली मां की टूटन में रोहित को अपने अपनों की छवि दिखी। और फिर वही स्टेशन, जो आत्महत्या का स्थान बनने वाला था, अब नए सपनों की जन्मभूमि बन गया।”

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अकेले हैं, तो क्या ग़म है…

अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है। यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं।अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है।

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मस्‍त हवा का इक झौंका

यह कविता मां और बच्चों के प्रेम और यादों की भावनाओं को उजागर करती है। जीवन में अलगाव, पालन-पोषण और अंततः मातृत्व के अद्भुत बंधन को दर्शाती यह कविता भावनात्मक और मार्मिक है। प्रत्येक पंक्ति में माँ और बच्चे के बीच के गहरे प्यार और यादों का सौंदर्य दिखाई देता है।

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सफ़ेद में लिपटी लड़की

वह लड़की ज़िंदगी को प्रेम की तरह जीना चाहती थी .शहर की भागदौड़ से दूर, पहाड़ों और जंगलों के बीच, हवा में बाँसुरी की धुन सुनते हुए। उसके हाथ में हमेशा पेन रहता, और हर शब्द उसके दिल की गहरी भावना बन जाता। वह जानती थी कि मौत भी तभी खूबसूरत होगी, जब वह लिखते-लिखते उसे मिले. जैसे जीवन का हर पल उसके प्यार और उसकी स्याही में समा गया हो।

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डाकिया डाक लाया

जब मोबाइल और ई-मेल नहीं थे, तब खत ही रिश्तों की धड़कन हुआ करते थे। पोस्टकार्ड से लेकर लिफाफे तक, हर पत्र में सिर्फ़ खबर नहीं, पूरा जीवन लिखा होता था। यह कहानी उसी इंतज़ार, उस स्याही और उन भावनाओं की है, जो आज भी दिल को भिगो देती हैं।

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मैं कैसे हार मान लूं…

यह प्रेरणादायक लेख ज़िंदगी के संघर्षों और कठिनाइयों के बीच उम्मीद और दृढ़ता का संदेश देता है। लेखक बताती हैं कि हर ठोकर, हर असफलता और हर कठिन समय हमें मजबूत बनाता है। हार मानना केवल सपनों और उम्मीदों को छोड़ देना है। जीवन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और सपनों की जीत है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है, और हमारे दिल की आवाज़ हमेशा यही कहती है—“मैं कैसे हार मान लूं?”

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

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कलियुग

कहते हैं कि कलियुग आ चुका है, लेकिन अब लगता है कि वह चारों दिशाओं में फैलकर मनुष्य के भीतर गहराई तक उतर चुका है। रिश्तों में विष घुल गया है भाई भाई का नहीं रहा, माँ घर की देहरी से बाहर धकेल दी गई, और धन ही सम्मान का नया मापदंड बन गया। समाज में भय, हिंसा, लोभ और छल ऐसी सहजता से घुलमिल गए हैं कि कोई उन्हें असामान्य भी नहीं मानता। प्रकृति भी जैसे मनुष्यों के पापों की साक्षी बनकर अपना क्रोध दिखा रही है नदियाँ मार्ग बदल रही हैं, वर्षा अनियंत्रित हो रही है और जीवन असुरक्षा में डूबता जा रहा है।

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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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