रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
हाँ, मैं बहक गई थी.
और यह कहने में मुझे न कोई शर्म है, न कोई अ़फसोस. मैं अनुष्का हूँ. मुंबई में पली-बढ़ी, कॉलेज के दिनों में विशाल से प्यार हुआ. चारपाँच साल का रिश्ता थागहरा, सच्चा. लेकिन किसी वजह से हम अलग हो गए. फिर ज़िंदगी अपनी-अपनी राह पर बढ़ चली.
मेरी शादी अजय से हुई. शादी से पहले मैंने अपने अतीत के बारे में उसे सब कुछ बता दिया था. उसने भी स्वीकार किया था कि वह अपनी पहली प्रेमिका को कभी पूरी तरह भूल नहीं पाएगा. आखिर पहला प्यार कौन भूल पाता है? इसके बावजूद हमने अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत बहुत खूबसूरत ढंग से की. दो साल में हमारी एक प्यारी-सी बेटी भी हो गई.
लेकिन मेरी प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद सब कुछ बदलने लगा. वजन बढ़ गया था, शरीर और मनदोनों में बदलाव थे. मुझे अजय की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा थीभावनात्मक भी, शारीरिक भी. पर अजय मुझसे दूर होता जा रहा था. वह ज़्यादातर समय मोबाइल, टीवी और ऑफिस में उलझा रहता. कई बार हॉल में ही सो जाता और मैं उसका इंतज़ार करती रह जाती.
सास का कहना था-आदमी है, कुछ भी करे. औरतों को समझौता करना ही पड़ता है.अजय अपनी फीमेल मैनेजर के साथ पार्टियों में व्यस्त रहने लगा. कई बार दोतीन दिन के लिए शहर से बाहर चला जाता. मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं था, पर जब पूछती तो वह कह देता-मेरी ज़िंदगी में दख़ल मत दिया करो.
मैं नहीं जानती थी कि उनका रिश्ता स़िर्फ प्रोफेशनल था या कुछ और, लेकिन मैं एक पत्नी थीअपने पति को किसी और के साथ सहजता से कैसे देख सकती थी?
एक बार अजय तीन दिन की मीटिंग का कहकर गया और ़फोन बंद कर लिया.जब लौटा, मुझे मुंबई जाना था एक पारिवारिक समारोह में. उसने स़ाफ मना कर दियाङ्गङ्घअब यही तुम्हारा घर है, मेरे हिसाब से रहना पड़ेगा.. उस दिन बहुत झगड़ा हुआ.
अपने पति होने के अधिकार वह जताता रहा, और मैं अपने आज़ाद ख़यालों के साथउसकी इजाज़त के बिना घर से निकल गई.मुंबई पहुँची तो पूरी तरह टूटी हुई थी. पुराने दोस्तों से मिली, खुद को संभालने की कोशिश की. उन्हीं में से एक दोस्त के ज़रिए मेरी फिर से विशाल से बात हुई. मैं उससे मिलना चाहती थी. जब मिली, तो जानावह आज तक मेरी यादों से आगे नहीं बढ़ पाया था.
मैंने उससे कहा-अब मैं पहले जैसी नहीं रही बहुत बदल गई हूँ.
वह मुस्कुराया और बोला-मुझे तुमसे प्यार है. तुम जैसी भी हो, मेरा प्यार कम नहीं होगा.-उसके शब्दों ने मुझे पिघला दिया.
मैं रो पड़ी. उसने मुझे थाम लियाबिना किसी सवाल के, बिना किसी शर्त के. कुछ पल पुरानी यादों में बह गए.
और फिर मैं खुद को रोक नहीं पाई.
मैं बहक गई थी?या बहकना चाहती थी?
जो भी था, उस पल मैं खुश थी.
मुंबई से लौटते वक्त तक मैं विशाल के प्यार में डूबी हुई थी. जब वापस आई, तो अजय ने मेरे भीतर आए बदलाव स़ाफ देख लिए थे. मैं खुश थी, जीवित थीऔर उससे दूर. एक दिन उसने सीधे पूछ लिया- क्या तुम विशाल से मिलकर आई हो? मैंने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा-हाँ.
उसने पूछा-क्यों?
मैंने जवाब दिया-जब तुम तीन दिन बाहर रहकर आते हो, तो क्या मुझे वजह बतानी होती है?वह चुप रह गया.
फिर उसका अगला सवाल अधूरा था-क्या तुम उसके साथ?
मैं समझ चुकी थी.मैं बिना कुछ कहे उठी और अपने काम में लग गई. वह भी समझ चुका था. उस दिन वह लैपटॉप उठाकर ऑफिस चला गया. शायद तभी उसे एहसास हुआ कि एक शादी स़िर्फ औरत की ज़िम्मेदारी नहीं होती मर्द की भी उतनी ही जवाबदेही होती है.
कुछ दिनों बाद अजय बदलने लगा. वह मुझे और हमारी बेटी को समय देने लगा. बिना कुछ कहे,हम दोनों आगे बढ़ गए.
लेकिन एक सवाल आज भी मेरे भीतर है.क्या मैं बहक गई थी? या मुझे उस बहकने तक पहुँचा दिया गया था?

खोखले होते हुए रिश्तों का यथार्थ लिखा है .. बहुत ख़ूब 👌👌