क्या मैं बहक गई थी…?

मैं बहक गई थी और यह मानने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं। जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मेरा पति मुझसे दूर था। उसी खालीपन में एक पुराना प्यार फिर से सामने आया, जिसने मुझे वह अपनापन दिया जो मैं भूल चुकी थी। उस एक सच ने हमारी शादी को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे आईना दिखा गया।

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असली वजह

त्योहार और व्रत जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन समय के साथ उन्हें निभाने की शक्ति और परिस्थिति भी बदलती है। सेनु हर साल पूरे उत्साह से व्रत करती है, पर पति की चिड़चिड़ाहट उसे खटकती है। सब्ज़ी मंडी की भीड़, पूजा की लंबी सूची और वर्षों की थकान के बीच पति का यह कहना कि “भक्ति उतनी ही करो जितनी शक्ति हो” उसे भीतर तक छू जाता है। आखिरकार, त्यौहार का अर्थ ईश्वर को खुश करना नहीं, बल्कि अपने परिवार और खुद को संतुलन में रखना भी है।

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