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असली वजह

मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका, पटना (बिहार)

सड़क के दोनों किनारों पर ठेलों की लाइन लगी थी और बीच में फंसी हुई गाड़ियां!
टी…ई…ई…ई!
लगातार सायरन!

स्कूटी के ठीक पीछे जहाज-सी खड़ी बोलेरो का ड्राइवर कुछ ज़्यादा ही जल्दी में था।
सेनु का दिमाग भन्ना रहा था, मन किया बोले—
“क्यों मरे जा रहे हो! ज़्यादा जल्दी थी तो टायर की जगह पंखे (डैने) लगवा लेने चाहिए थे!”
पर आगे की सीट पर बैठे पति को देखकर चुप हो गई।
एक तो ऐसे ही कल से बक-बक सुन रही थी।

“यार सालभर में एक-आध पर्व तो छोड़ दो! ज़रूरत क्या है सबकी सब करने की! पर नहीं! तुम तो चलता-फिरता ठाकुर प्रसाद का कैलेंडर हो! हर त्योहार मनाना है और ख़ासकर वो ज़रूर जिसमें अंतड़ियां जलें!”

सेनु को हंसी आ रही थी, पर कुछ बोलना मतलब खौलते तेल में पानी छींटना!

“अच्छा है न! भूखे रहकर पैसे बचाती हूं आपकी!”
वो हंसी रोकती हुई बोली।

“ओहो! हे देवी जी! आप इतनी कृपा न करें मेरे ऊपर! आपके एहसान तले दब जाऊंगा! पेट सोंधाने की ज़रूरत नहीं! खाया करें आप मन भर! उसी से मेरा उद्धार होगा!”

हाथ जोड़े पति का चेहरा देखते ही उसकी हंसी छूट गई। बीस साल से हर व्रत पर यही सुनती आ रही। अब तो आदत हो गई है, लेकिन जाने क्यों पतिदेव के गुस्से का उफान हर बार थोड़ा ज़्यादा दिख रहा!

कमरे में आकर पूजा की लिस्ट बनाते हुए हाथ एकदम से रुक गए!
क्या कारण हो सकता है? कहीं ये सच में तो नहीं थकने लगे मेरे तीज-त्योहारों से! पैसे की तंगी भी नहीं है, फिर क्यों इस तरह उखड़ जा रहे आजकल!

पिछली बार भी दुर्गा पूजा पर मैंने नौ दिन फलाहार की बात कही तो बिगड़ने लगे—
“अरवा खाकर पाठ करती हो वहीं बहुत है! अब ये क्या नया सूझा—फलाहार करूंगी, अन्न नहीं खाऊंगी!”
वो चुप रह गई थी। आज फिर वैसे ही!

बेमन से लिस्ट बनाने लगी।
सतपुतिया, झींगली, नोनी साग, पोय साग, कुशी मटर, कंदा, बद्धी, कमर डोरा, लव-कुश…
सामान की लंबी कतार थी। इनको लिस्ट पकड़ाएगी तो और चिक-चिक!

“खुद ही ले आती हूं…” सोचकर उसने स्कूटी की चाबी उठाई ही थी कि—
पतिदेव दोनों हेलमेट लेकर सीढ़ियां उतरने लगे।

स्कूटी स्टार्ट हुई, वो चुपचाप पीछे बैठ गई।

“आप यहीं इंतज़ार कीजिए, भीड़ ज़्यादा है, मैं सब लेकर यहीं आती हूं!”
सब्ज़ी मंडी से थोड़ी दूर ही एक जूस की दुकान के पास सेनु ने स्कूटी रुकवा दी।

वो बढ़ी।
संतान की लंबी उम्र के लिए करने वाला ये व्रत बिहार में पूरे उत्साह से मनाया जाता है। पहले दिन नहा-धोकर स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है, जिसमें वैसी सब्ज़ियों को बनाना ज़रूरी है जिन्हें पूरे साल शायद ही घर में लाते हैं। दूसरे दिन निर्जला रहकर फल और मिष्ठान से लव-कुश की पूजा की जाती है और उसकी अगली सुबह पुनः पूजा के बाद ही कुछ ग्रहण किया जाता है।

चूंकि फल-सब्ज़ियों और पूजा की अन्य सामग्री के अलावा व्रतियों में धागे या सोने के जितिया (नाव जैसी आकृति वाले लॉकेट) पहनने का रिवाज़ होता है, नए कपड़े लिए जाते हैं, तो अमूमन आधा शहर सड़क पर ही होता है।

सेनु आने को तो आ गई अकेले, पर भीड़ और सामान का वज़न!
अभी तो कितनी ही चीज़ें पड़ी हैं और वो अभी ही थक गई!

थैले के वज़न से हथेली पर निशान पड़ने लगे। उसने एकाध पैकेट दूसरे हाथ में लेने चाहे, तभी—
किसी ने भारी थैला उठा लिया।

मुड़कर देखा तो पति महोदय!

“कुछ छूटा नहीं न! याद कर लो एक बार!”
लौटते वक्त उन्होंने पूछा।

“नहीं! सब हो गया…वैसे थैंक यू!”

“क्यों भई!”

“मुझे लगा तुम उखड़े हुए हो तो आओगे नहीं साथ! इधर से हर पूजा में चिड़चिड़ करते रहते हो। अब पसंद नहीं आते क्या तुम्हें पूजा-पाठ?”

“नहीं सेनु! मेरे चिढ़ने की वजह कुछ और है। तुम करो न जितनी मन चाहे भक्ति, लेकिन उतनी ही जितनी शक्ति हो! शादी के बाद से देख रहा हूं तुम्हें—त्योहार हो या कोई व्रत—पूरी श्रद्धा से मनाती हो। पर सेनु! अब उम्र बढ़ रही यार! तुम्हें लगता है सब कर लोगी, पर शारीरिक क्षमता घटती है। बुरा मत मानना, लेकिन इनमें भी फ्लेक्सिबिलिटी ज़रूरी है। हम गृहस्थ लोग हैं, संन्यासी नहीं! तो उतना ही करो जो शरीर बर्दाश्त कर पाए। और क्या लगता है! तुम्हें भूखे-प्यासे देखकर ईश्वर खुश होते होंगे? ना! बिल्कुल नहीं! वे भी दुखी होते हैं और मैं भी! तुम समझ रही हो न बाबू..!”

“सब समझ रही हूं!”
कहकर सेनु ने अपना सिर उनकी पीठ से टिका दिया। मन तो हो रहा था चूम ही ले, पर ज़रा भीड़ थी सड़कों पर… कोई नहीं! घर अब पास ही है…

3 thoughts on “असली वजह

    1. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, इसी तरह आपका स्नेह बना रहे
      – सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

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