इश्क नहीं… मगर कम भी नहीं
रिद्धिमा और राघव की यह कहानी प्रेम, अपनापन और भावनात्मक सीमाओं के बीच खड़े एक ऐसे रिश्ते की दास्तान है, जहाँ स्नेह है, पर अधिकार नहीं।

रिद्धिमा और राघव की यह कहानी प्रेम, अपनापन और भावनात्मक सीमाओं के बीच खड़े एक ऐसे रिश्ते की दास्तान है, जहाँ स्नेह है, पर अधिकार नहीं।
यह कविता गाँव की मिट्टी, रिश्तों की गर्माहट और अपनों के स्नेह की ओर लौटने की भावनात्मक पुकार है। शहर की भागदौड़ में छूट गए गाँव, बूढ़े माता-पिता और सूने खलिहानों की याद मन को बार-बार अपनी जड़ों की ओर खींचती है। कविता बताती है कि गाँव में रिश्ते दिखावे से नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम से निभाए जाते हैं, जहाँ सुख-दुख बाँटकर जीवन जिया जाता है। पीपल, बरगद और आम की छाँव, शुद्ध हवा और मिट्टी का सहज स्पर्श उस आत्मीय सुख का एहसास कराते हैं, जो कहीं और दुर्लभ है।
मैं बहक गई थी और यह मानने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं। जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मेरा पति मुझसे दूर था। उसी खालीपन में एक पुराना प्यार फिर से सामने आया, जिसने मुझे वह अपनापन दिया जो मैं भूल चुकी थी। उस एक सच ने हमारी शादी को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे आईना दिखा गया।