नई रिसर्च का खुलासा: कार्बोहाइड्रेट खाते ही शरीर खुद बनाने लगता है शराब

-सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
क्या बिना शराब की एक बूंद पिए कभी ऐसा हुआ है कि आप लड़खड़ाने लगे हों, बात करते समय शब्द उलझ जाएं, या अचानक ऐसा महसूस हो कि आप पूरी तरह नशे में हैं? अगर हां, तो यह महज थकान या कमजोरी नहीं, बल्कि पेट के अंदर चल रही एक अदृश्य शराब फैक्ट्री का संकेत हो सकता है.वैज्ञानिकों के अनुसार, यह स्थिति ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम नामक एक दुर्लभ लेकिन गंभीर गट डिसऑर्डर के कारण होती है, जिसमें इंसानी शरीर खुद शराब बनाने लगता है. खास बात यह है कि व्यक्ति को इसका पता तक नहीं चलता और वह सामाजिक, मानसिक और कानूनी परेशानियों में फंस सकता है.
पेट में चल रही शराब की फैक्ट्री
हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका नेचर माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि आंतों में मौजूद कुछ विशेष बैक्टीरिया और यीस्ट भोजन में मौजूद शर्करा को किण्वित कर एथेनॉल यानी शराब बना देते हैं्. यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही होती है जैसी शराब की फैक्ट्री में होती है.
शोध के अनुसार, सामान्य हालात में शरीर इस अल्कोहल को खत्म कर देता है, लेकिन ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम में यह उत्पादन इतना ज्यादा हो जाता है कि खून में अल्कोहल का स्तर नशे की सीमा तक पहुंच जाता है.रोटी, चावल और पास्ता बन सकते हैं ट्रिगर
इस बीमारी का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन जैसे रोटी, चावल, पास्ता, आलू और मीठे पेय इसके लक्षणों को बढ़ा सकते हैं्. खाना खाने के कुछ घंटों बाद या कभी-कभी २४ घंटे के भीतर व्यक्ति में नशे जैसे लक्षण उभरने लगते हैं, जिससे लोग इसे अचानक हुई समस्या समझ लेते हैं्.नशे जैसे लक्षण, लेकिन वजह अलग
विशेषज्ञों के अनुसार इसके लक्षणों में चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना, बोलने में लड़खड़ाहट, दिमाग में धुंधलापन, निर्णय क्षमता कम होना, याददाश्त कमजोर होना और अत्यधिक थकान शामिल हैं्. कई मामलों में मरीजों को ब्लैकआउट और सामाजिक अपमान तक झेलना पड़ता है, क्योंकि आसपास के लोग उन्हें शराबी समझ लेते हैं्.इलाज की नई उम्मीद
अध्ययन की सह-वरिष्ठ शोधकर्ता और बोस्टन स्थित मैस जनरल ब्रिघम की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. एलिज़ाबेथ होहमैन के अनुसार, ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम लंबे समय तक गलत समझा गया रोग रहा है. अब हमने उन बैक्टीरिया की पहचान कर ली है जो इसके लिए जिम्मेदार हैं्.शोध में यह भी सामने आया कि एक मरीज को फीकल ट्रांसप्लांट के बाद उल्लेखनीय राहत मिली, जिससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में माइक्रोबायोम आधारित उपचार इस बीमारी का प्रभावी समाधान बन सकता है.पहचान न होने से बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में अब तक १०० से भी कम मामले दर्ज किए गए हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई मरीज गलत निदान का शिकार हो सकते हैं्. कई बार ऐसे लोगों को मानसिक रोगी या शराब का आदी मान लिया जाता है, जबकि असली वजह उनके पेट में मौजूद बैक्टीरिया होते हैं्.विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को बार-बार बिना शराब पिए नशे जैसे लक्षण महसूस हों, तो इसे नजरअंदाज न करें्. स्टूल टेस्ट, गट माइक्रोबायोम जांच और विशेषज्ञ की सलाह से समय रहते इस दुर्लभ बीमारी की पहचान की जा सकती है.बिना शराब पिए नशे में होना अब मजाक नहीं, बल्कि शरीर के भीतर छिपी बीमारी का संकेत हो सकता है.
