स्वच्छता का सम्मान, इंसानियत का उत्सव

जब देश के कई शहरों में स्वच्छता सिर्फ नारे तक सीमित रह गई है, तब इंदौर ने लगातार आठवीं बार स्वच्छता में अव्वल आकर पूरे देश को बता दिया है कि बदलाव सिर्फ योजनाओं से नहीं, बल्कि शहरवासियों के जज्बे और जागरूकता से आता है. इंदौर की यह उपलब्धि सिर्फ सफाई व्यवस्था की जीत नहीं है, बल्कि वहां के नागरिकों की सोच, संस्कृति और इंदौरियत की जीत है.
इंदौर एक ऐसा शहर है, जिसने बैलगाड़ी और तांगे के दौर से मेट्रो की रफ्तार तक का सफर तय किया है. शहर के गुवाड़ियों से लेकर पॉश कॉलोनियों तक के नागरिकों ने स्वच्छता को केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी आदत और संस्कार बना लिया है. यही कारण है कि इंदौर आज स्वच्छ भारत मिशन का सबसे चमकता सितारा है.
पुणे की घटना और इंदौर की प्रेरणा
दूसरी तरफ देश के दूसरे बड़े शहरों में, जैसे पुणे में, रात्रि पाली में सफाईकर्मियों के साथ हो रही हिंसा और दुर्व्यवहार की घटनाएं एक दर्दनाक तस्वीर पेश करती हैं. वहां सफाईकर्मी जो रातभर जागकर शहर को जगने से पहले चमकाते हैं, उन्हें ही सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल रहा. कहीं एफआईआर दर्ज नहीं होती, कहीं घंटों थानों में दौड़ाया जाता है.इसके ठीक विपरीत इंदौर में वह दृश्य देखने को मिला जो इंसानियत को गर्व से भर दे. वहां सुबह-सुबह कचरा एकत्रित करने आने वाले सफाईकर्मियों का न सिर्फ स्वागत हुआ, बल्कि हार पहनाकर, स्मृति चिन्ह और नगद पुरस्कार देकर उनका सम्मान किया गया. इसकी शुरुआत की वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा और उनकी धर्मपत्नी ने, और देखते ही देखते यह एक अनुकरणीय सामाजिक पहल बन गई. इंदौर के नागरिकों ने यह बता दिया कि स्वच्छता सिर्फ सफाई की नहीं, सोच की होती है. स्वच्छता के सैनिकों का सम्मान करने से न केवल समाज में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है, बल्कि एक नई पीढ़ी को सिखाया जाता है कि किसी भी व्यवस्था के पीछे मेहनतकश इंसानों का पसीना बहता है.हमारे शहर के चौराहे, गलियां, गार्डन भले चमकते हों, लेकिन यदि हम उन्हें चमकाने वाले हाथों को सम्मान नहीं देंगे, तो यह स्वच्छता अधूरी है. इंदौर इस बात का आदर्श बन चुका है.
एक छोटी सी अपील, एक बड़ा बदलाव
अगर आप इंदौर जैसे शहर में रहते हैं तो इस परंपरा को आगे बढ़ाइए. यदि नहीं, तब भी कम से कम इतना तो कर ही सकते हैंकचरा सड़क पर मत फेंकिए, सफाईकर्मियों से सम्मान से बात कीजिए, उन्हें सलाम कीजिए.
याद रखिए, स्वच्छता सिर्फ सफाईकर्मियों की जिम्मेदारी नहीं, हमारी भी नैतिक जिम्मेदारी है.
स्वच्छता का सम्मान करिए,
सफाईकर्मियों को सलाम करिए,
क्योंकि जब शहर चमकता है,
तब मानवता भी चमकती है.
शाबाश इंदौर! तुमने बता दिया इंदौरियत जिंदा है.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज, पुणे

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