महिला स्वास्थ्य पर महिला विमर्श कार्यक्रम संपन्न

शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उज्जैन एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, महिला कार्य, उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान में महिला विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय “महिला स्वास्थ्य: सर्वोच्च प्राथमिकता” रहा।

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जब सवाल कपड़ों का नहीं, मानसिकता का हो

भारत में बलात्कार की घटनाएँ हर उम्र और वर्ग को प्रभावित कर रही हैं छोटी बच्चियाँ, किशोर, महिलाएँ और यहाँ तक कि पुरुष भी शिकार बन रहे हैं। यह केवल शरीर का नहीं, मानसिकता का अपराध है। समाधान क़ानून के साथ-साथ शिक्षा, संवेदनशीलता और समाजिक चेतना में निहित है।

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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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ये कैसा दिवस?

हर वर्ष हम माता-पिता दिवस मनाते हैं, हिंदी दिवस मनाते हैं, और इसी तरह कई अन्य दिवस भी मनाते हैं। इन्हीं में एक दिन हम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म दिवस भी मना लेते हैं। फिर सब कुछ समाप्त। क्या एक दिन का स्मरण उनके सम्मान के लिए पर्याप्त है? हम कभी यह सोच भी नहीं पाते कि जिस तरह बंगाल ने रवींद्रनाथ टैगोर के गीत, संगीत, कला और साहित्य को न केवल सहेज कर रखा है, बल्कि उसे अपनी जीवनशैली में आत्मसात किया है — उसी तरह हमें भी अपने साहित्यकारों को सम्मान देना चाहिए। बंगाल का समाज अपने बच्चों को, आधुनिक होते परिवेश में भी, रवींद्रनाथ के प्रति सम्मान भाव से परिचित कराता है। समय-समय पर उनके सम्मान में आयोजन होते हैं।

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इंदौरियत जिंदा है…..

इंदौर ने स्वच्छता में लगातार आठवीं बार पहला स्थान पाकर यह सिद्ध कर दिया है कि जब नागरिक जागरूक हो जाएं तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं। जहां देश के कई शहरों में सफाईकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहीं इंदौर में उन्हें हार पहनाकर सम्मानित किया जा रहा है। यह सिर्फ स्वच्छता की जीत नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता की जीत है। इंदौर ने साबित किया है कि शहर की खूबसूरती केवल सड़कें नहीं, बल्कि वहां के लोगों का दिल भी होता है।

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जब तक शिष्टाचार जीवित, समाज भी जीवित

Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था।

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