जब तक शिष्टाचार जीवित, समाज भी जीवित


Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था। पर आज, मानो हम सब किसी अदृश्य दौड़ में लगे हैं, जहाँ मंज़िल का कोई अता-पता नहीं, लेकिन दौड़ना जरूरी है। सिर्फ़ दौड़ना ही जरूरी नहीं है कटाक्ष की , अभद्रता की तलवार हाथ में लेकर प्रहार करना भी जरूरी है।
मैं’ और ‘मेरा’ के घेरे में सिमटते जा रहे हम सब। सबको अपनी सफलता चाहिए, चाहे इसके लिए दूसरों की भावनाओं को कुचलना ही क्यों न पड़े। इस आत्म-केंद्रित सोच ने सामूहिक चेतना और सह-अस्तित्व की भावना को क्षीण कर दिया है।
फास्ट फॉरवर्ड के चक्कर में हम जा कहाँ रहे हैं?
हम तकनीकी रूप से जितनी ऊँचाई छू रहे हैं, मानवीय दृष्टि से उतनी ही गिरावट का सामना कर रहे हैं। तो क्या मान कर चलें कि आने वाले समय में भावनाएँ, सहानुभूति और शिष्टाचार जैसे गुण केवल किताबों तक सीमित रह जाएँगे??
शिष्टाचार कोई बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि हमारे भीतर की मानवता का परिचायक है। अगर हम इसे भूलते चले गए, तो हम केवल सामाजिक प्राणी बन कर रह जाएँगे, इंसान नहीं। समय है कि हम ठहरें, सोचें, और फिर से अपने भीतर उस संवेदनशील, सुसंस्कृत और सजीव इंसान को जगाएँ जो कभी हमारे समाज की आत्मा था।
क्योंकि जब तक शिष्टाचार जीवित है, तब तक समाज भी जीवित है।
जरूरी नहीं है स्वयं को सभ्य दिखाने के लिए सामने वाले की जाति, धर्म, कुटुंब पर प्रहार कर उसे शौचालय तक खींचा जाए।
हमें याद रखना चाहिए । “इंसान बनना जरूरी है बाकी सब बहुत बाद में आता है।”

नीना अंदोत्रा,

प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद

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