मौन का अपराध
आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।

आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।
आज का समाज दो चेहरों में जी रहा है एक वह जो भीतर सचमुच है और दूसरा वह जो बाहर दुनिया को दिखाया जाता है। खुशियाँ अब साझा कम और तुलना ज़्यादा बन गई हैं, जहाँ किसी की तरक्की दूसरे के भीतर जलन जगा देती है। झूठे वादों और बनावटी शान-ओ-शौकत के शोर के बीच बचपन चुपचाप वही सीख रहा है जो हम जी रहे हैं। अगर समय रहते हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ी को सच्चाई नहीं, बल्कि सिर्फ़ दिखावे से भरी एक चमकदार लेकिन खोखली दुनिया विरासत में मिलेगी।
इवा की साइकिल गायब थी और रोती हुई बच्ची बार-बार पूछ रही थी.“मम्मा, किसने ली?”
मनोरमा को तुरंत शक उसी कचरा उठाने वाले मनोज पर गया, जिसने कुछ दिन पहले साइकिल मांगने की बात कही थी। शिकायत पर मनोज को सामने लाकर खड़ा किया गया, वह केवल इतना बोल सका. “मैडम, मैंने नहीं ली… CCTV देख लीजिए।” उसी समय अरविंद का फोन आया और सच सामने आ गया.साइकिल तो उन्होंने ही मरम्मत के लिए भेजी थी।.मनोरमा के भीतर अपराधबोध भर गया. शक उसका था, गलती उसका पूर्वाग्रह।
*“असुंदर है”* समाज के विकृत चेहरों को उजागर करने वाली रचना है। कवि ने इस कविता में बार-बार “असुंदर है” कहकर हमारे भीतर और हमारे समाज में फैली उन कुरूप सच्चाइयों की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्हें हम सामान्य मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
कवि कहता है कि असुंदर है जब मनुष्य, मनुष्य के साथ भेदभाव करता है — किसी को महान और किसी को तुच्छ समझता है। यह असुंदर है जब पुरुष को मोक्ष का अधिकारी माना जाता है और स्त्री को पैरों की जूती समझा जाता है। असुंदर है जब पत्थरों को ईश्वर कहा जाता है, लेकिन मनुष्यों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है।
गाँव के बीच मंदिर बनाना और कुछ लोगों को गाँव के बाहर बसाना भी असुंदर है। पत्थरों की पूजा करते हुए उन्हीं पर पशुओं की बलि चढ़ाना और जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बाँटकर आपस में लड़ाना भी असुंदर है।
पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?
जीवन एक-वचन नहीं है। यह दो पत्थरों के रगड़ से जन्मी आग की तरह है—जहाँ दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे को प्रकाशित करता है। यह टकराहट नहीं, रचना है। हम सबके अनुभव अलग हैं, फिर भी जुड़ाव की ज़रूरत अपरिहार्य है। पर आज, हम सिर्फ़ व्यूज में हैं, अंतर्बोध में नहीं। जो घटित हो रहा है, वह केवल घटना नहीं, संवेदना है—लेकिन हम ठहरते नहीं, स्क्रॉल करते जाते हैं।
Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था।