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समानता की आड़ में लुप्त होती संस्कृति

समानता और स्वतंत्रता आज के समय के आवश्यक मूल्य हैं, परंतु जब इन्हें जिम्मेदारी और सांस्कृतिक मर्यादाओं से अलग कर दिया जाता है, तब समाज में असंतुलन पैदा होता है। भारतीय संस्कृति स्वतंत्रता के विरोध में नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और कर्तव्य के साथ जीवन जीने की सीख देती है। आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। संस्कृति हमें बाँधती नहीं, बल्कि सही दिशा देती है और जो समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, वह भीतर से खोखला हो जाता है।

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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जब तक शिष्टाचार जीवित, समाज भी जीवित

Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था।

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