
सुशीला शील स्वयंसिद्धा, प्रसिद्ध लेखिका, जयपुर
दहला देती हैं
यदा-कदा
अखबारों की सुर्खियाँ
जान देती बच्चियाँ
कुछ दिन
होती हैं सुगबुगाहटें
कैमरे-माइक-पत्रकार
घन से गरजते
बिजली से कड़कते
हो जाते हैं गायब
घन और बिजली
की ही तरह
घटनास्थल से
पुलिस और कानून
करते हैं अपना काम
केस और फाइल
सरकते हैं
घोंघे की रफ़्तार से
आम जनता को
दो जून की रोटी
लगती है ज़रूरी
हर मुद्दे से
असुरक्षित समाज के
सुरक्षित घरों में
अपने ही लोगों द्वारा
होता है यौन शोषण
सहमी सी कच्ची उम्र
कर ही नहीं पाती ज़िक्र
अपने माँ-पिता से
धमकियों के डर से
कुछ अमायरा
करती हैं साहस
दबा दी जाती हैं
उनकी चीखें
उनके आँसू
बच्चियों की इज़्ज़त
माँ-बाप की इज़्ज़त से
हार जाती है
अक्सर
कुछ अमायरा
पी जाती हैं
ज़हर के घूंट
जी जाती हैं
मन-आत्मा-देह से रिसते
कभी न भरने वाले
घावों के साथ
किंतु कुछ अमायरा
नहीं मरना चाहती
हर दिन
पा लेती हैं मुक्ति
हर तरह के दर्द
दर्द भरी ज़िंदगी से
सुनो अमायरा!
आज बाल-दिवस पर
बहुत याद आ रही हो तुम
ईश्वर तुम्हें
अपनी गोद में
भरपूर प्रेम दें
कि भूल सको तुम
इस धरती के
तमाम दुख-दर्द
अब सोना
पूरे चैन से
कभी न खुलने वाली
नींद में
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

बहुत ही सटीक टिप्पणी वर्तमान समाज पर
धन्यवाद आदरणीय मधु जी 🌹🙏
👌👌👌