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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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“देह, निर्णय और दरारें”

पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?

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