gulmohar
अस्पताल के प्रतीक्षालय में अपनी छोटी बच्ची को तलाशती चिंतित माँ।

वह दस मिनट… जो जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगी

अस्पताल की भीड़ में खेलती दो साल की बच्ची अचानक गायब हो गई। एक माँ के लिए वे दस मिनट किसी भयावह सपने से कम नहीं थे। यह सच्चा अनुभव बच्चों की सुरक्षा, सतर्कता और अनजान लोगों पर भरोसा करने से जुड़े जरूरी सवाल उठाता है।

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फ़र्क

एक पल में तान्या का भरोसा टूट गया और माँ दुर्गा जाग उठीं। जिस चेहरे को उसने पिता का रूप मान लिया था, वही चेहरा बच्चों की सुरक्षा पर सवाल बन गया। उस दिन उसे समझ आया—रिश्ता होना और रिश्ता दिखना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है।

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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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