
सुरभि डागर, प्रसिद्ध लेखिका, बिजनौर
किसी बीज से उगा एक पौधा
आहिस्ता आहिस्ता वृक्ष में
रूपांतरित होता रहता है।
निकल आतीं है नई नई टहनियांँ
कोमल नरम पत्ते,
फूलों और फलों से लदा पेड़
झूम उठते है।
तेज़ धूप, झमाझम बारिश,
कोहरा और हवा के तूफानी झोंकें।
न जाने क्या कुछ सहा होगा वृक्ष ने।
पेड़ से वृक्ष होने के लिए
होने लगता है अभिमान डालियों
और पत्तों को स्वयं के अस्तित्व पर
और पुराना वृक्ष फैलाता रहता है
अपनी जड़ों को भूमि में भीतर ही भीतर
और खड़ा रहता है तूफान में भी।
टूट कर गिर जातीं हैं अहंकारी डालियांँ
और घमंडी पत्ते , तेज हवा का झोंका उड़ा ले
जाता है वृक्ष की छाया से कोसों दूर।
पुराने पेड़ से निकलने लगती हैं
कोंपलें और लग जाता वृक्ष उन
कोंपलों को पालने में जो
बन सकें कोंपलों की मजबूत
और अहंकार रहित।
