खामोश मोहब्बत
कुछ प्यार ऐसे होते हैं जो कभी शब्दों में नहीं ढलते, फिर भी सबसे सच्चे होते हैं। “खामोश मोहब्बत” एक ऐसी ही अनकही भावनाओं की कविता है, जो दिल को छू जाती है।
पंचक्रोशी यात्रा : तय तारीख से पहले ही आस्था का सैलाब
ज्जैन में पंचक्रोशी यात्रा की औपचारिक शुरुआत से पहले ही हजारों श्रद्धालु 118 किमी लंबी पदयात्रा पर निकल पड़े। महाकाल के जयघोष और अटूट आस्था के साथ भक्त कठिन रास्तों को पार करते हुए अपने आध्यात्मिक सफर को पूरा करने में जुटे हैं।
कीचड़ का कमल
कीचड़ का कमल” प्रेम और जिम्मेदारियों के बीच फँसी एक स्त्री के अंतर्द्वंद्व को बखूबी उकेरती है। यह कविता बताती है कि हर प्रेम कहानी मुकम्मल नहीं होती कभी परिस्थितियाँ, कभी परिवार और कभी सच का सामना रिश्तों को बदल देता है। यहाँ प्रेम पवित्र है, लेकिन आत्मसम्मान और परिवार की गरिमा उससे भी बड़ा सत्य बनकर उभरते हैं।
मरु-स्त्री
मरु-स्त्री” एक ऐसी कविता है जो रेगिस्तान की कठोरता के बीच जीती स्त्री के भीतर छिपी अनकही विरासत और पीड़ा को उजागर करती है। यहाँ प्यास केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक मौन धरोहर है। यह स्त्री रेत की तरह बिखरती नहीं, बल्कि फैलकर अपने अस्तित्व को जीवित रखती है। उसकी हर चाल, हर चुप्पी और हर प्रतीक्षा में संघर्ष, सहनशीलता और जीवन की अदम्य शक्ति झलकती है जो मरुस्थल की सूनी धरती में भी हरियाली की तरह आशा जगाती है
सैनिक का अंतर्मन
यह कविता एक सैनिक के अंतर्मन की उन गहराइयों को उजागर करती है, जहाँ कर्तव्य और भावनाएँ एक साथ सांस लेती हैं। वह अपने परिवारपत्नी, बहन, पिता और माँसे दूर होते हुए भी उनसे गहराई से जुड़ा रहता है, लेकिन देश के प्रति अपने वचन को सर्वोपरि रखता है। उसके भीतर का प्रेम त्याग में बदल जाता है, और उसकी हर विदाई एक अनकही पीड़ा के साथ-साथ गर्व का संदेश भी छोड़ जाती है। यह रचना बताती है कि एक सैनिक केवल सरहदों की रक्षा नहीं करता, बल्कि अपने दिल के सबसे करीब रिश्तों को पीछे छोड़कर पूरे देश को अपना परिवार मान लेता है।
गुलाबी दीवारों वाला कमरा
गुलाबी दीवारों वाला वह कमरा दो अनकही ज़िंदगियों का मिलन-बिंदु था, जहाँ बारिश की बूंदों के साथ भावनाएँ भी ठहरती थीं। किताबों, चुप्पियों और साझा क्षणों के बीच अमृता और श्रुति का रिश्ता धीरे-धीरे आकार लेता है—एक ऐसा संबंध जो शब्दों से परे है। समाज की सीमाओं और भीतर के डर के बीच झूलता यह अनकहा प्रेम कभी दूरियों में बिखरता है, तो कभी यादों में सिमट आता है, और अंततः यह एहसास छोड़ जाता है कि सच्चे रिश्ते खत्म नहीं होते वे बस अपना रूप बदल लेते हैं।
ज़हरीली हवाएँ
रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।
कुर्सी का किस्सा: यादों में बसती एक परंपरा
महिदपुर रोड के बाजार में दुकानों के बाहर रखी एक साधारण कुर्सी कभी व्यापार की एक अनोखी परंपरा का प्रतीक हुआ करती थी। यह कुर्सी बताती थी कि दुकान की ‘बोनी’ हुई है या नहीं, और इसी के साथ जुड़ी थी आपसी समझ, अपनापन और बाजार की अनकही भाषा। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन यह कुर्सी अब भी उन सुनहरी यादों को जीवित रखे हुए है।
