महामुलिया: बचपन का उत्सव
कटनी की मिट्टी में महाकौशल, बघेलखंड और बुंदेलखंड की संस्कृति का सुंदर संगम दिखाई देता है। अक्षय तृतीया और महामुलिया जैसे लोकपर्व इस क्षेत्र की लोक-आस्था, परंपरा और बालमन की खुशियों को जीवंत रखते हैं।

कटनी की मिट्टी में महाकौशल, बघेलखंड और बुंदेलखंड की संस्कृति का सुंदर संगम दिखाई देता है। अक्षय तृतीया और महामुलिया जैसे लोकपर्व इस क्षेत्र की लोक-आस्था, परंपरा और बालमन की खुशियों को जीवंत रखते हैं।
विदेश में सफलता की तलाश में मोहन अपने परिवार और घर से दूर हो गया। वर्षों बाद लौटने पर उसे एहसास हुआ कि पैसों से बड़ी दौलत उसके पिता, परिवार और उसी घर में उसका इंतजार कर रही थी।
पति की असमय मृत्यु के बाद मेघा यादों और अकेलेपन में सिमट गई थी। समाज की बदलती नजरों के बीच सास के एक निर्णय ने उसके सामने जिंदगी को नए सिरे से देखने का रास्ता खोल दिया।
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे शाम होते ही गांव की गलियों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती थी. घरों के चूल्हों से उठता धुआं धीरे-धीरे आसमान में घुलता, गाय-बछड़े लौटकर अपने ठिकानों पर पहुंचने लगते और खेतों से आती हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुल जाती. इसी समय मेरी बड़ी…
हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता और हर सफर मंज़िल तक नहीं पहुँचता। ‘चलो छोड़ो भी…’ कविता टूटते भरोसे, बदलते रिश्तों और जीवन में समय के साथ आगे बढ़ने की बात कहती है।
सोशल मीडिया के दौर में रिश्तों को जाहिर करने का अंदाज भी बदल गया है। कोई अपने साथी की मौजूदगी के छोटे-छोटे संकेत देता है तो कोई रिश्ते को खुलकर स्वीकार करता है। जानिए इस बदलते चलन के पीछे की वजह।
कभी कोई लौटकर सिर्फ एक बार मुड़कर देख ले, तो बरसों की रंजिशें मिट सकती हैं। यह कविता प्रेम, इंतज़ार, विरह और बीते पलों की उन यादों को स्वर देती है, जो आज भी दिल में जीवित हैं।
कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।