शब्दों का मौन
जब शब्द जन्म लेना बंद कर देते हैं, तब लेखक सबसे अधिक बेचैन होता है। यह कविता उसी सृजनात्मक मौन, भीतर की उदासी और प्रकृति से संवाद के माध्यम से लेखन की रहस्यमयी पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है।

जब शब्द जन्म लेना बंद कर देते हैं, तब लेखक सबसे अधिक बेचैन होता है। यह कविता उसी सृजनात्मक मौन, भीतर की उदासी और प्रकृति से संवाद के माध्यम से लेखन की रहस्यमयी पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है।
‘मैं जानता हूँ, फिर भी…’ एक विचारोत्तेजक मुक्तछंद कविता है, जो युद्ध की भयावहता, निर्दोष लोगों की पीड़ा, युद्ध-विराम की राहत और मानवता की अमर जिजीविषा को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। यह कविता विनाश के बीच भी उम्मीद और शांति के महत्व को रेखांकित करती है।
‘कर्ण की व्यथा’ महाभारत के महान योद्धा सूर्यपुत्र कर्ण के मन में छिपे उस दर्द को शब्द देती है, जहाँ जन्म, पहचान, रिश्ते और नियति के बीच उनका अकेलापन मुखर होकर सामने आता है। यह कविता पाठकों को कर्ण के अंतर्मन से जोड़ती है।
जब कोई व्यक्ति हमारे जीवन में उम्मीद, सुकून और नई शुरुआत बनकर आता है, तो शब्द अपने आप कविता बन जाते हैं। “आंधियों में जलते दिए की बात हो तुम” ऐसी ही एक भावपूर्ण प्रेम कविता है, जिसमें प्रेम को पहली बरसात, उम्मीद की लौ और जीवन की अनमोल सौगात के रूप में महसूस किया गया है। हर पंक्ति दिल की गहराइयों से निकले जज़्बातों को सहज और खूबसूरत अंदाज़ में व्यक्त करती है।
होटल में बैठा एक परिवार तरह-तरह की रोटियों का ऑर्डर दे रहा था। तभी पिता बाहर मिली एक भूखी वृद्धा का ज़िक्र करते हैं, जो केवल एक सूखी रोटी की आस लगाए बैठी थी। यह सुनकर बेटा चुपचाप अपनी प्लेट से रोटियाँ लेकर बाहर चला जाता है। लौटते समय उसके शब्द सभी के दिल को छू लेते हैं रोटी का असली स्वाद उसकी किस्म में नहीं, बल्कि किसी भूखे का पेट भरने के बाद मिलने वाले सुकून में होता है।
घर के एक कोने में रखी वह पुरानी कुर्सी आज भी केवल लकड़ी का एक फर्नीचर नहीं लगती। वह पिता की आदतों, उनके अनुशासन, उनके स्नेह और पूरे परिवार की अनगिनत यादों की साक्षी है। इस मार्मिक संस्मरण में एक बेटी अपनी स्मृतियों के सहारे उस खाली कुर्सी में आज भी अपने पापा की मुस्कुराती हुई छवि देखती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने अपने पिता को खोया है या उनकी यादों को संजोए रखा है।
ज़ीनत की ज़िंदगी बागबानी, परिवार और अपने छात्रों के बीच खुशी से बीत रही थी। शादी की सालगिरह मनाने के लिए वह अपने पति फ़रीद और बेटे के साथ मुंबई के ताज होटल पहुँचती है। लेकिन 26 नवंबर 2008 की वह रात उनकी ज़िंदगी की सबसे भयावह रात बन जाती है। गोलियों, धमाकों और दहशत के बीच यह कहानी सिर्फ़ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि इंसानियत, प्रेम और आतंकवाद के खिलाफ़ खड़े होने वाले साहस की भी मार्मिक दास्तान है।
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सीख अपने नहीं, बल्कि सफर में मिले अनजान लोग दे जाते हैं। यह मार्मिक रेल यात्रा संस्मरण एक नवविवाहित दंपती और एक सहयात्री के बीच हुए संवाद के माध्यम से प्रेम, धैर्य, संयुक्त परिवार और रिश्तों की खूबसूरती को उजागर करता है। कहानी बताती है कि रिश्तों में आने वाली कठिनाइयाँ स्थायी नहीं होतीं। धैर्य, संवाद और विश्वास से हर संबंध इंद्रधनुष की तरह फिर से रंगों से भर सकता है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने कभी जीवन के किसी सफर में अनमोल इंसान और अनमोल सीख पाई हो।