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आसमान की ओर देखते हुए आत्मचिंतन में डूबा एक युवा, जो अपनी पहचान और जीवन के उद्देश्य की तलाश कर रहा है।

मैं कौन हूँ ?

“मैं कौन हूँ?”—यह सिर्फ़ तीन शब्दों का सवाल नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का सफ़र है। यह लेख एक युवा की आत्मखोज, संघर्ष, बदलाव, आत्मविश्वास और सपनों की कहानी है, जो बताती है कि इंसान की असली पहचान उसके निरंतर सीखने और बदलने की प्रक्रिया में छिपी होती है।

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द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित क्रिकेट कोच दिनेश लाड, रोहित शर्मा के गुरु और भारतीय क्रिकेट की नई प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करते हुए।

​खामोश शिल्पकार : दिनेश लाड

द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित दिनेश लाड ने आर्थिक संघर्षों के बावजूद भारतीय क्रिकेट को कई सितारे दिए। रोहित शर्मा और शार्दुल ठाकुर जैसे खिलाड़ियों के गुरु दिनेश लाड आज भी बिना किसी शुल्क के बच्चों को क्रिकेट सिखाकर देश के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।

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स्टेशन पर विदा होते राघव और रिद्धिमा, आँखों में प्रेम और बिछड़ने की नमी

वो तीन दिन

तीन दिन, एक शहर और उम्र भर की यादें” राघव और रिद्धिमा की ऐसी भावनात्मक प्रेम कहानी है, जिसमें एक छोटी-सी मुलाकात जीवनभर की स्मृतियों में बदल जाती है। अदरक वाली चाय, मेहंदी में छिपा नाम, छत पर बिताई तारों भरी रात और स्टेशन पर बिछड़ने का दर्द ये छोटे-छोटे पल उनके रिश्ते की सबसे बड़ी पूंजी बन जाते हैं। यह कहानी बताती है कि सच्चे रिश्तों में दूरी मायने नहीं रखती, क्योंकि कुछ मुलाकातें समय से नहीं, दिल से जुड़ी होती हैं।

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रात में फोन पर बात करते राघव और रिद्धिमा, जिनके चेहरों पर प्रेम और अपनापन झलक रहा है

तुम्हारा बाय कहना मुझे अच्छा नहीं लगता..

“तुम्हारा ‘बाय’ कहना मुझे अच्छा नहीं लगता” राघव और रिद्धिमा की एक बेहद भावुक प्रेम कहानी है। इसमें दिखाया गया है कि रिश्तों की गहराई बड़े वादों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शब्दों और उनके पीछे छिपे एहसासों में होती है। रिद्धिमा के लिए “बाय” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि बिछड़ने का एहसास है, जबकि राघव उसके भावों को समझकर अपनी विदाई का अंदाज़ बदल देता है। यह कहानी प्रेम, अपनापन और अगली मुलाकात की उम्मीद को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत करती है।

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धुंधले शहर की पृष्ठभूमि में अकेला शायर, न्याय के तराज़ू और बिखरे हुए मुखौटों का प्रतीकात्मक दृश्य

किसे गुनहगार कहें

“किसे गुनहगार कहें” एक समकालीन हिंदी ग़ज़ल है, जो समाज, न्याय व्यवस्था और नैतिक मूल्यों पर गहरी चोट करती है। हर शेर वर्तमान समय की विडंबनाओं को उजागर करता है, जहाँ सच और झूठ की सीमाएँ धुंधली होती दिखाई देती हैं। बाज़ारवाद, न्याय, आरोप और सफलता के बदलते अर्थों पर तीखा व्यंग्य करती यह ग़ज़ल पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह रचना आज के सामाजिक यथार्थ का सशक्त प्रतिबिंब है।

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बचपन से साथ रही दो भारतीय सहेलियाँ मुस्कुराते हुए पुरानी यादें साझा करती हुईं

अटूट दोस्ती

“अटूट दोस्ती” दो सहेलियों की सच्ची और निश्छल मित्रता का भावपूर्ण संस्मरण है। बचपन में साथ खेलना, स्कूल और कॉलेज के दिनों की शरारतें, संस्कृत की ट्यूशन की यादें, एक ही तारीख को विवाह होना और शादी के बाद भी रिश्ते को उसी आत्मीयता से निभाना—यह संस्मरण दोस्ती के अनमोल रिश्ते को जीवंत करता है। समय और परिस्थितियाँ बदलती रहीं, लेकिन दोनों सहेलियों का विश्वास, प्रेम और अपनापन आज भी वैसा ही बना हुआ है। यह रचना सच्ची मित्रता की सुंदर मिसाल प्रस्तुत करती है।

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कठिन समय में अपनी सहेली का हाथ थामकर हौसला देती एक महिला

सच्चा सारथी

“सच्चा सारथी” एक हृदयस्पर्शी संस्मरण है, जिसमें लेखिका ने अपनी सच्ची मित्र हेमलता के निस्वार्थ सहयोग, आत्मीयता और कठिन समय में निभाए गए साथ को भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है। जीवन के संघर्ष, मानसिक पीड़ा और पारिवारिक संकट के बीच एक सच्चे मित्र ने किस प्रकार संबल बनकर जीवन को नई दिशा दी, यह रचना उसी अनुभव का सजीव चित्रण है। यह संस्मरण बताता है कि सच्ची मित्रता केवल साथ निभाने का नहीं, बल्कि जीवन को संभालने का भी नाम है।

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माँ की पुरानी नीली साड़ी को हाथों में थामे भावुक बेटा और विवाह के जोड़े में वही साड़ी ओढ़े दुल्हन

पल्लू में बँधा आसमाँ

“पल्लू में बँधा आसमाँ” माँ की ममता, स्मृतियों और भावनात्मक विरासत को समर्पित एक मार्मिक हिंदी कहानी है। माधव अपनी दिवंगत माँ की पुरानी साड़ी को केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि बचपन की सुरक्षा, प्रेम और अपनत्व का प्रतीक मानता है। उसकी मंगेतर अनन्या उस साड़ी को अपने विवाह के जोड़े का हिस्सा बनाकर यह सिद्ध करती है कि सच्ची विरासत वस्तुओं में नहीं, उनसे जुड़ी भावनाओं में बसती है। यह कहानी माँ के अटूट स्नेह और परिवार के अमूल्य रिश्तों को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।

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गुरु पूर्णिमा पर गुरु के चरण स्पर्श करते शिष्य, साथ में माता-पिता और दीपक का आध्यात्मिक दृश्य

आषाढ़ पूर्णिमा… गुरु पूर्णिमा पर विशेष

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रस्तुत यह प्रेरक लेख माता-पिता, गुरु और धरती माँ के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान का संदेश देता है। लेख में माँ के वात्सल्य, पिता के त्याग, धरती माँ के उपकार तथा गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान और जीवन-दर्शन का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए यह लेख पाठकों को अपने जीवन के सभी गुरुओं का सम्मान करने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है।

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ज्ञान का प्रकाश फैलाते दिव्य गुरु के चरणों में नतमस्तक शिष्य

जय गुरुवर

जय गुरुवर” गुरु की महिमा, ज्ञान, कर्म और आध्यात्मिक चेतना को समर्पित एक ओजपूर्ण एवं भक्तिमय कविता है। इसमें गुरु को ज्ञान का पुंज, जीवन रूपी नौका के पथप्रदर्शक और अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाले परम प्रकाश के रूप में चित्रित किया गया है। कविता यह संदेश देती है कि गुरु ही जीवन को सही दिशा, श्रेष्ठ कर्म और मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत यह रचना भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का सुंदर एवं प्रेरक स्वरूप प्रस्तुत करती है।

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