बापू तेरे देश में…
‘बापू तेरे देश में’ कविता बदलते सामाजिक परिवेश की तस्वीर सामने रखते हुए सत्य, मानवीयता, पर्यावरण और सामाजिक व्यवहार जैसे विषयों पर गंभीर सवाल उठाती है।
मेरे हिस्से की पीड़ाएँ
मेरे हिस्से की पीड़ाएँ मुझे स्वीकार हैं, क्योंकि संघर्ष से घबराना मेरी प्रकृति नहीं। प्रेम, त्याग और आत्मबल से भरी यह कविता जीवन के हर रण में स्वयं पर विश्वास रखने की बात करती है।
चिड़िया
22 वर्ष की एक नवविवाहिता, दूर-दराज़ के सरकारी अस्पताल में तैनात पति और एक सुनसान सरकारी मकान। पति के दौरे पर चले जाने के बाद अकेलेपन से जूझती उस स्त्री की दुनिया माँ की यादों और किताबों के सहारे चलती है। एक सर्द रात खिड़की के बाहर चिड़िया की आवाज़ उसके भीतर दबे अतीत का ऐसा दरवाज़ा खोल देती है, जहाँ माँ का आँचल, अब्बा का दुलार और बचपन की सुरक्षित दुनिया फिर जीवित हो उठती है।
विपरीत हवाओं में उड़ना
विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ना आसान नहीं होता। यह कविता संघर्ष, परिवर्तन, प्रेम और असंभव लगने वाली परिस्थितियों के बीच उम्मीद की तलाश को अभिव्यक्त करती है।
SIR के बीच मतदाता का भरोसा
SIR और Form 6 को लेकर जारी विवाद अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रहा। चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, अतिरिक्त घोषणा-पत्र और सुप्रीम कोर्ट में पहुंची याचिका ने चुनावी पारदर्शिता और मतदाता के भरोसे को बहस के केंद्र में ला दिया है।
हमाम के नंगे
जाति और धर्म से ऊपर उठने की बातें करने वाला आदर्शवाद जब रोजमर्रा के व्यवहार की छोटी-सी परीक्षा में बदल जाता है, तब कथनी और करनी का अंतर उजागर हो जाता है।
