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कॉपी, किताब, नोटबुक्स टैक्स फ्री और रॉ मटेरियल पर 18 % जीएसटी

सरकारी प्रचार तंत्र भले ही जीएसटी दरों को कम करने को देश में उत्सवी माहौल बताए लेकिन हकीकत में कुछ व्यापारी खुश नहीं है। कॉपी, नोटबुक्स, किताब निर्माताओं से तो किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की है कि 22 सितंबर से लागू जीएसटी की नई दरें उनका तनाव क्यों बढ़ा रही हैं।निर्माता वर्ग की पीड़ा है सरकार ने बस घोषणा ही की है, हमारा कान तो पीछे से पकड़ कर जोर से दबा दिया है।

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“अस्तित्व”

“दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की राहों में भी, छोटे-छोटे क्षण और यादें हमारे अस्तित्व को जीने का साहस और संबल देती हैं। गुप्तधन जैसे नन्हा दीपक, उड़ते पंछी, यादों की कुप्पी—ये सब हमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अपने अस्तित्व के साथ जुड़ने का अनुभव कराते हैं।

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पार्क में एक व्यक्ति बुजुर्ग की मदद करते हुए, सकारात्मकता और मानसिक शांति का दृश्य

खुशी…

“हमारी खुशी में सबसे बड़ी बाधा हम खुद बनते हैं। नकारात्मक विचार और माहौल हमें एंग्जायटी में डाल सकते हैं। इसलिए अपनी दिनचर्या में हल्की फेरबदल करें, अपनी हॉबी और दूसरों के लिए समय निकालें, और परोपकार को अपनाएँ—क्योंकि दूसरों की मदद करना, हमारी आत्मशुद्धि का सबसे बड़ा मार्ग है।”

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बरसात, भक्ति और मेला

“बरसात से लबालब भरे गाँव का दृश्य। चारों ओर पानी ही पानी, ताल-तलैया और खेतों में भरे जल के बीच पगडंडी डूबी हुई है। कुछ ग्रामीण घुटनों तक कपड़ा उठाए, हाथ में चप्पल पकड़े सावधानी से रास्ता पार कर रहे हैं। बच्चे किनारे पर खड़े हँसते-खिलखिलाते तालियाँ बजा रहे हैं। दूर खुले-खुले पैतृक घर और हरसिंगार का पेड़ दिख रहा है, जिसकी झरती कलियाँ पूजा के लिए टोकरी में भरी जा रही हैं। पृष्ठभूमि में गाँव का दुर्गा पूजा पंडाल, मिट्टी की प्रतिमा, जलते दीपक और ढाक-वादन से गूँजता भक्तिमय वातावरण दिखाई दे रहा है।”

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मां कुष्मांडा की स्तुति

“बुध ग्रह की स्वामिनी, ममता का रूप धारण करने वाली मां कुष्मांडा, भक्तों को रूप-बुद्धि प्रदान करती हैं और अष्टभुजा से दुष्टों का संहार करती हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर पीले रंग का पूजन, केसर पेड़ा और मालपुए का भोग अति प्रिय है।”

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मुंबई में फिल्म राइटर के रूप में काम करती श्वेता बोथरा की प्रेरणादायक कहानी

शाबाश… श्वेता

उज्जैन के छोटे कस्बे महिदपुर रोड से आई श्वेता बोथरा ने हौसले, दृढ़ निश्चय और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। महेश भट्ट और अनु मलिक के साथ डेब्यू कर उन्होंने साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। शिक्षा पूरी करने और मीडिया मैनेजमेंट में एमबीए के बाद श्वेता ने ओरकॉम एडवरटाइजिंग, इंदौर से करियर शुरू किया, लेकिन लेखन का जुनून उन्हें मुंबई ले गया।

उनकी लिखी फिल्म “तू मेरी पूरी कहानी” एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे प्यार और करियर के बीच कठिन निर्णय लेना होता है। श्वेता की कहानी हज़ारों लड़कियों और युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है—सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए हौसला, मेहनत और जुनून ही सबसे बड़ा हथियार हैं।

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आओ ज़रा जी लें

कविता में छिपे भाव जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अनदेखे लम्हों की याद दिलाते हैं। नीरसता और उदासी में भी हम अपने भीतर की रौशनी को खोज सकते हैं। यादों में मुस्कुराते हुए लम्हे, जीवन के कठिन समय में भी राहत और उत्साह की ठंडी हवा बनकर हमारे मन को सहलाते हैं। ये लम्हे हमें याद दिलाते हैं कि हर पल एक कविता है, जो जीवन की महाकाव्य रचना में नए छंद जोड़ती है। इसे जीना, उसे महसूस करना और हर पल को उत्सव में बदल देना ही जीवन की असली खुशी है।

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ज्ञान परंपरा और भूगोल पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला

सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन में “भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेष संदर्भ में भूगोल विषय” पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर अर्पण भारद्वाज के निर्देशन में कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में भूगोल विषय के पाठ्यक्रम निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित करना है।

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पट समय के खोलने दो

कविता की हर पंक्ति भीतर से निकलती हुई आत्मा की पुकार थी। उसने खुद को दीप की तरह जलने दिया, ताकि उसकी रौशनी चारों ओर फैले। कैद की दीवारें अब उसे रोक नहीं सकती थीं; हँसने, बहने और खुलकर जीने का समय आ गया था।

भीतर की नदी को जब उसने खोल दिया, तो उसके किनारे टूट गए और जहाँ भी पड़ी, जीवन भीग गया। भूले हुए राग अब ताल में लौट आए, खलिश की पुरानी यादें गीत बनकर बह गईं। जीवन के फीके रंग अब नए सपनों के रंग में घुलने लगे। हवाओं की घुटन और रात की निशा भी खुल गई; समय के पट अब खुल चुके थे।

यह कविता एक स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की कहानी थी—जहाँ भीतर की ऊर्जा और रचनात्मकता खुलकर बहती है, और आत्मा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जीने का अवसर मिलता है।

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बरसों बाद कलम उठाकर कविता लिखती महिला कवयित्री

आत्मसंतुष्टि

बरसों बाद जब रेणू ने कलम उठाई, उसके दिल और दिमाग में अजीब सी मस्ती फैल गई। शब्दों का सागर उसके भीतर गोते लगा रहा था, और दिमाग उस सागर से मोती चुनकर उन्हें पंक्तियों में सजाने में व्यस्त था। भावनाओं की लहरें उठ रही थीं, और उसकी नाव—जो कविता का रूप धारण कर चुकी थी—उन लहरों को पार कर रही थी। हर शब्द, हर भाव उसे आत्मसंतुष्टि के द्वार तक ले गया। रेणू ने महसूस किया कि लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का साधन भी है। उसकी नाविक बनकर, वह अपनी रचनात्मकता की शक्ति को महसूस करते हुए आत्मसंतुष्टि के द्वार पर पहुँच गई।

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