छोड़ो ना अपना क्या जाता है…
हर बार जब समाज की किसी समस्या पर हम चुप रह जाते हैं और सोचते हैं“अपना क्या जाता है”, तब इंसानियत थोड़ा और मर जाती है। यह कविता उसी संवेदनहीन सोच पर तीखा प्रहार करती है।

हर बार जब समाज की किसी समस्या पर हम चुप रह जाते हैं और सोचते हैं“अपना क्या जाता है”, तब इंसानियत थोड़ा और मर जाती है। यह कविता उसी संवेदनहीन सोच पर तीखा प्रहार करती है।
कभी-कभी ज़बान से निकले जुमले इतने तेज़ और धारदार होते हैं जैसे कमान से छूटा हुआ तीर।
जिसका ज़िक्र दिल की धड़कनों में रच-बस जाए, उसे भला जान से कैसे जुदा किया जा सकता है?
पर सच यह है कि कुछ बातों में दम नहीं होता।
लोग अपने ही बयान से हल्के और खोखले साबित हो जाते हैं। कभी ऐसा भी हुआ कि किसी ने मुझे देख लिया और छिप गया, जैसे मैं ही उसके सामने आईना हूँ। उस पल महसूस हुआ कि मकान से बाहर निकलते ही इंसान अपने असली रूप में आ जाता है।
“पचपन नहीं… छप्पन बरस हो गए हमारी शादी को।”वृद्धा ने हँसते हुए कहा, और वृद्ध भी मुस्करा दिए। सुबह से ही फोन की ट्रिन-ट्रिन ने उन्हें परेशान किया था, पर अब समझ आया. यह बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ें थीं।
यादों की परतें खुलीं—इलाहाबाद के दिन, बच्चों की हंसी, कंधों पर बैठा कर दिखाई गई चौकी, रजाई के भीतर की मूँगफली… और आज वही बच्चे हिसाब मांगते हैं, शिकायतें करते हैं। पर इस सुबह आदित्य के गुलदस्ते और अर्चना की हंसी नेवृद्ध दंपति की आँखों को बारिश की बूँदों-सा चमका दिया।
प्रेम मेरे लिए कभी प्रश्न नहीं रहा।
मैंने देखा है तृणों को ओस की बूँदों को थामते हुए,
नन्हें जीवों को अपनी माँ की खोज में भटकते हुए,
धरती को तपिश में बादलों के लिए तड़पते हुए,
और पतझड़ को बसंत की याद में बिलखते हुए।
मेरे लिए तो यही है प्रेम की सबसे संजीदा कहानी जहाँ पीड़ा भी करुणा में ढल जाती है,
और आँसू भी कविता बनकर बह निकलते हैं।
यह रचना युद्ध और विनाश के बीच मासूम बच्चों की दृढ़ता और आशा को सामने लाती है। चारों ओर मलबा, बारूद की गंध और प्रियजनों की लाशों का दर्द भरा माहौल है, लेकिन बच्चे अब भी खेल रहे हैं, हँस रहे हैं और जीवन को थामे हुए हैं। उनकी हँसी एक विरोधाभास है—जहाँ दुख का महासागर गहरा है, वहीं उनकी निश्छलता और दिलकश मुस्कान उम्मीद की किरण जगाती है।
यह कविता दिल के जख़्मों और दर्द को शब्दों और संगीत के रूप में ढालने की बात करती है। इसमें भाव है कि दिल अपने हर दर्द, हर टूटे सपने और हर बिखरे पल को सहेजकर उन्हें गीत, नग़मा और ग़ज़ल में बदल देता है। दुख और तकलीफ़ भी जब सुर और लय में ढलते हैं तो वे मधुर तराने बन जाते हैं। हर अक्षर एक दास्तां कहता है, हर धड़कन में संगीत छिपा है, और हर ग़म को गीत एक मीठे अहसास में बदल देता है। यह दृष्टिकोण जीवन को केवल तकलीफ़ों की कहानी न मानकर, उन तकलीफ़ों को एक सुंदर अफ़साने और मधुर यादों में ढालने की प्रेरणा देता है।
बरसों के अंतराल में, उस समय तुम बिना किसी रोक-टोक के प्रेम में डूबे थे, और मैं भी उसी प्रेम में भीग रही थी। तुम्हें नीला रंग पसंद था, और मैं नीलम की तरह दमक रही थी। हमारे शब्द एक मधुर लय में बह रहे थे, जैसे दो प्रेमी अपने सपनों के गीत गा रहे हों। मैं प्रेम की नदी बनी थी, और तुम, पुरुष, बांध बनाने के लिए पत्थर चुनने लगे। हमारे गीत उन पत्थरों से टकरा कर शब्द बनाते रहे, फिर धीरे-धीरे बिखर गए। तुम लगातार बरसते रहे, और मैं सूख गई।
सुनो पुरुष, प्रेम के घर बांधों से नहीं बनते, ये बहती नदी के नावों पर बनते हैं। व्यस्त हाथों के बावजूद, उस सूखी जमीन के भीतर अब भी एक नीली-सी नदी बह रही है। क्योंकि प्रेम में खो जाना भी प्रेम में होना ही माना जाता है।
आईसीयू के दरवाज़े से आती बीप-बीप की आवाज़ रिश्तों की बची-खुची संवेदनाओं पर अंतिम प्रहार कर रही थी। अस्पताल की मशीनें बस शरीर को खींच रही थीं, और बाहर घरवाले—इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के स्मार्ट पैकेज में रिश्तों का अंतिम संस्कार तय कर रहे थे।”
“महिदपुर रोड का वह स्कूल बगीचा कभी शहर की साँसों का सहारा था। कतारबद्ध वृक्ष मानो ध्यानमग्न तपस्वी की तरह खड़े रहते, पूर्णिमा की रात को झक-सफेद बगुलों और फूलों से लदकर ताजमहल से भी सुंदर दिखते। उन पेड़ों के नीचे की घास पर बैठकर साँझ गुज़ारना, मिट्टी की सौंधी खुश्बू में साँस लेना और सर्दियों में धूप में लगने वाली कक्षा—ये सब जीवन का अनमोल हिस्सा थे। आज वहीं घास की जगह पॉलीथिन है, हरियाली की जगह कचरा और सुना है कि अब वहाँ बस स्टैंड बनेगा। विकास की इस दौड़ में हमने अपनी असली खूबसूरती कहीं पीछे छोड़ दी है।”
लकीरों और दायरों ने हमें अलग करने की कोशिश की, पर हर दूरी में तुम और अधिक मेरी ओर सिमट आईं। जिन दीवारों ने हमें रोका था, वे धीरे-धीरे ढहने लगीं। तुम, जो किसी सैलाब की अमानत थीं, अब अपने भीतर की उफान को थामकर शांत बहने लगीं। और जब होंठों ने चुप्पी साध ली, तब निगाहों ने वह सब कह दिया जो शब्दों में बयाँ न हो सका।