gulmohar

सिंदूर-खेला

पूजा पंडाल में ढोल की थाप गूँज रही थी। विसर्जन से ठीक पहले का दिन! लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी में सजी महिलाएँ माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर, एक-दूसरे की माँग और गालों पर रंग भर रही थीं।

भीड़ के बीच खड़ी रितुपर्णा बाहर से मुस्करा रही थी, मगर भीतर खालीपन था। कुछ महीने पहले पति ने शराब के नशे में घर से निकाल दिया था। अकेली रहती तो ठीक था, पर बच्चे की परवरिश? सोचकर दिल डूब जाता।

तभी उसकी नज़र पंडाल के कोने में गई—एक आदमी अपनी पत्नी पर चिल्ला रहा था। अगले ही पल गाल पर जोरदार थप्पड़! भीड़ ने देखा, पर सब चुप। औरत आँचल मसलती, आँखें झुकाए आँसू पोंछ रही थी।

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शक्ति हो माँ

माँ, तुम ममता की मूर्ति हो, धीरज और करुणा का अथाह सागर। तुम्हारे आगे शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं। आकाश तुम्हें नमन करता है और धरती तुम्हारी आरती उतारती है। जीवन के हर सुख-दुख में तुम्हारा हाथ थाम लेने से मन को संबल मिलता है। मेरी प्रत्येक साँस तुम्हारी ही देन है, हर क्षण तुम्हारे ध्यान में ही बीतता है।

जब-जब मन डगमगाता है, आँखों में तुम्हारा रूप बसाकर स्थिरता मिलती है। तुम्हारे चरणों में सिर झुकाना ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। अंतिम क्षणों में भी यदि तुम्हारे दर्शन मिल जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाएगा।

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सागर

सागर की बलखाती लहरें मानो किसी प्रियजन को पुकार रही हों। हर उठती-गिरती मौज एक गीत है—कोमल, मधुर और रहस्यमय। कभी लगता है कि ये लहरें चाँद से धीमे-धीमे बातें कर रही हैं, अपने भीतर छिपे राज़ को साझा कर रही हैं। हवा भी इसमें शामिल हो जाती है, गुनगुनाहट में एक नई धुन जोड़ देती है।

रात का आकाश सितारों से झिलमिलाता है, और सागर उस रोशनी को अपने सीने में समेटकर जैसे सुबह की प्रतीक्षा करता है। सुबह का आकर्षण उसे दीवाना बना देता है—हर लहर में एक झनक, जैसे झाँझर की मधुर ध्वनि।इन लहरों में न जाने कितनी कहानियाँ बसी हैं। कुछ रंगीन सपनों की, कुछ भोली नादानियों की। मन चाहता है कि इन पलों को पलकों में बाँध लूँ, जगमगाते मोतियों की तरह सँभालकर रख लूँ।

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फ़िरोज़ी मफ़लर

नवंबर की पीली शामों में अकेले बाहर न निकलो। इस महीने की धूप छलावा है—तुम उसकी गुनगुनी ऊँगली पकड़कर चलते रहोगे, और वह अचानक किसी और के साथ भाग जाएगी। फिर तुम्हें रास्ता भी नहीं मिलेगा, क्योंकि सूखे पत्तों के बीच हमेशा हरे-भरे पत्ते खो जाते हैं।

ठहरो… कहा तो था कि हम तुम्हारे साथ चलेंगे। पिछले बरस का तुम्हारा अधूरा फ़िरोज़ी मफलर अब बुनाई के अंतिम मोड़ पर है। आओ, मिलकर सर्दियों की तैयारियाँ करें—हम दोनों साथ।

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नारी के सम्मान से ही देवी पूजा सार्थक

नवरात्रि और दुर्गा पूजा केवल देवी की मूर्तियों की आराधना तक सीमित नहीं हैं। यदि समाज में नारी असुरक्षित है, तो देवी पूजन का वास्तविक भाव अधूरा रह जाता है। नारी सिर्फ पूजा का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की अधिकारी है। उसे सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता मिलती है, तभी देवी की शक्ति, ज्ञान और ममता का प्रतीक सजीव होता है। भारतीय परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है, और वही शक्ति घर और समाज की आधारशिला है। मंदिर में दीप जलाना आसान है, पर हर घर, गली और कार्यस्थल पर नारी को सुरक्षित और स्वतंत्र बनाना ही सच्ची भक्ति है। नवरात्रि हमें यही प्रेरणा देती है कि नारी को देवी मानने का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि उसके जीवन को सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना है।

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माँ शैलपुत्री

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र) प्रथम शैलपुत्री देवी,आज नवरात्र में कृपा बरसाए माँ।भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। पहला दिन शैलपुत्री स्वरूप,पर्वतराज हिमालय की पुत्री तू।पूर्व जन्म में राजा दक्ष की थी पुत्री,तब माँ का नाम पड़ गया था सती।। तेरी महिमा सारी कह न सके माँ,भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। सती…

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मोह और प्रेम

लिखने को कुछ नहीं था, परंतु शब्द मस्तिष्क में ऐसे कुलबुला रहे थे मानो बाहर आने को व्याकुल हों।
मन के दो छोर सामने थे—एक ओर मोह, जो मुट्ठी में क़ैद था, और दूसरी ओर प्रेम, जो आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था। यह विडंबना ही थी कि प्रेम ने ही मोह को जन्म दिया, फिर भी उसी की कैद प्रेम को असह्य हो गई।मोह के भीतर संदेह के जीवाणु पलते रहे, जिन्हें प्रेम ने कभी स्वीकार नहीं किया।प्रेम बसंत की शुरुआत था—नवजीवन का उत्सव, जबकि मोह पतझड़ का सूना संदेश।
प्रेम उमड़ते समंदर की लहर था, मोह रेत का वह कण, जो मुट्ठी में थमता ही नहीं और फिसल जाने को आतुर रहता है।

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प्रकृति के बदलते स्वरूप और खोती इंसानियत के बीच समय से सवाल करती एकाकी महिला

ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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हमको सूरज है बनना

“हमको सूरज है बनना—चाहे जलना पड़े। अंधकार दूर भगाना, पाप मिटाना और जीवन में प्रकाश फैलाना ही हमारा प्रण है। यह कविता साहस, एकता और सेवा की प्रेरणा देती है।”

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नवरात्रि: भक्ति से शक्ति की यात्रा

“नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह हमें हमारे भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने, हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखने और आत्मविश्वास से अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।”

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