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डॉ. वर्षा महेश गरिमा को मिला पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार

मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित अलंकरण समारोह में सुप्रसिद्ध युवा रचनाकार डॉ. वर्षा महेश गरिमा को उनकी प्रथम कृति क्षितिज की ओर (कविता संग्रह) के लिए प्रादेशिक स्तर का पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार प्रदान किया गया.यह समारोह राजधानी भोपाल के रवीन्द्र भवन स्थित अंजनी सभागार में संपन्न हुआ, जहाँ साहित्य जगत से जुड़े अनेक विद्वान, रचनाकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे.कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात खेल कमेंटेटर पद्मश्री सुनील दोषी रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्कृति विभाग के संचालक एन. पी. नामदेव उपस्थित थे.

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जाग रे इंसान

गुरु मनुष्य को समझाते हैं कि हे इंसान, अब सो मत, जाग जा। तेरे जीवन का अधिकांश समय काम और जिम्मेदारियों में बीतता है, परंतु यदि तू तेईस घंटे कर्म करता है तो एक घंटा प्रभु के ध्यान के लिए अवश्य निकाल। यही तेरे जीवन का सच्चा संतुलन है।

मनुष्य का यह शरीर नौ द्वारों से बना है, जिनसे वह सांसारिक कार्य करता है। परंतु जब वह शब्द-ध्वनि के माध्यम से दसवें द्वार से जुड़ता है, तब उसे भगवान का साक्षात्कार होता है। यही शाश्वत सत्य है।शब्द ही वह शक्ति है जिसने धरती और आकाश को थाम रखा है। सृष्टि की जननी शब्द है, और शब्द ही प्रकाश देता है। जो इस सत्य को पहचान लेता है, वही ईश्वर की निकटता को प्राप्त करता है।
जो मनुष्य तन और मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता, वह कालचक्र में फँसा रहता है। ऐसा व्यक्ति जीवन भर संघर्ष करता है और अंततः उसे सबकुछ त्यागकर जाना पड़ता है।

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आज़ादी स्त्री की…

उस स्त्री की आत्मा कहती है—”मैंने हमेशा यही सोचा था कि मैं आज़ाद हूँ। पर हर पड़ाव पर बंधनों ने मुझे जकड़ लिया।
कभी भाई ने मेरे वस्त्रों पर नियंत्रण किया, कभी सास ने मेरी इच्छाओं को ढकने के लिए पल्ले और क्लिप्स थमा दिए। जीवन भर मैंने परंपराओं, रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर अपने अस्तित्व को ढका। और फिर मृत्यु आई। सफेद चादर में लिपटी मैं, अपनी ही देह को राख होते देखती रही।

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यादें

मन जब अतीत की ओर लौटता है तो उसे उन अधूरी इच्छाओं और अधूरे पलों का बोध होता है, जो समय की सीमाओं में बँधकर कभी साकार न हो सके। प्रेम के वे भाव, जो पूरी तरह व्यक्त होने से पहले ही ठहर गए—जैसे बादल तो आए, मन के आकाश में छा गए, पर बरसने से पहले ही थम गए। उन भावों की सुगंध, उन इच्छाओं की मासूमियत आज भी भीतर कहीं जीवित है, पर वे कभी वास्तविकता का रूप न ले सकीं।
इन्हीं स्मृतियों में यह सत्य भी उजागर होता है कि जीवन में सब कुछ पूर्ण नहीं होता। कुछ बहारें अधूरी रह जाती हैं, कुछ ऋतुएँ बिना खिले ही ढल जाती हैं। प्रेम की गहराई भी कई बार अपने संपूर्ण रूप तक नहीं पहुँच पाती। यह अधूरापन ही जीवन का हिस्सा है.

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अधूरे ख़्वाबों का सफ़र

दिल एक स्थायी ठिकाना नहीं है, यह किसी मुसाफ़िर का डेरा है। कभी यह ठहर जाता है, तो कभी अचानक कहीं और निकल पड़ता है। इसमें रुकने का कोई नियम नहीं है—यह क्षणिक है, चंचल है। इंसान सोचता है कि दिल अब सुकून पाएगा, किन्हीं भावनाओं में ठहर जाएगा, मगर अगले ही पल यह फिर चल पड़ता है, नई राहों की तलाश में। जैसे कोई मुसाफ़िर यात्रा के बीच कहीं विश्राम करता है और फिर सुबह होते ही अगले पड़ाव की ओर निकल जाता है, वैसे ही दिल भी है—कभी आता है, कभी ठहरता है और फिर चुपचाप आगे बढ़ जाता है।

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ऐ जिन्दगी

यह कविता एक आत्मीय संवाद की तरह है जिसमें जीवन से धीमे चलने की विनती की गई है। इसमें अकेलेपन, कठिन रास्तों और यादों की संगत को बहुत सहज भाव से व्यक्त किया गया है। कवयित्री कहती है कि जिन्दगी ने अपने हिस्से की धूप तो दी, पर अब वह ठंडी हवाओं और तन्हा रास्तों के बीच खुद को समेटे हुए है। बावजूद इसके, भीतर कहीं एक उम्मीद अब भी जीवित है कि शायद कोई राह ज़रूर होगी जो उसे उसके “जीवन” तक पहुँचा देगी।

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कुछ तो कहो…

यह कविता मानो दो हृदयों के बीच बसा एक मधुर संवाद है। कवि मौन को तोड़ने की विनती करता है, ताकि प्रेम की अनुभूति केवल हृदय में ही न रहे बल्कि शब्दों और भावों में भी प्रकट हो सके। इसमें अनुराग, लज्जा और समर्पण का सहज प्रवाह है। कहीं प्रेयसी का श्रृंगार उसकी प्रतीक्षा का प्रतीक बनता है तो कहीं प्रियतम का एक संकेत ही उसकी जीत ठहरता है। यह रचना प्रेम की उस अनकही भाषा को गूँज देती है, जिसमें मौन भी बोलता है और दृष्टि भी गीत गाती है।

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जीवन जंग नहीं

यह कविता जीवन को केवल संघर्ष और काँटों से भरा हुआ मानने की मानसिकता को तोड़ती है। कवि कहता है कि जीवन सिर्फ कठिनाइयों और कटु अनुभवों का नाम नहीं है, बल्कि इसमें फूलों जैसी सुंदरता, मधुरता और उमंगें भी समाई हुई हैं।
जीवन की राह में यदि कोई विचलित होकर बीच में ही रुक जाए तो वह अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच सकता। पराजय के डर से भागने वाला कभी विजयी नहीं कहलाता। अंधकार से भयभीत होकर रुकने वाला व्यक्ति प्रकाश की ओर कदम नहीं बढ़ा सकता। दूरी से हताश होने वाला कभी मंज़िल तक नहीं पहुँच पाता।

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बन्द

झुग्गी-झोपड़ी में शिक्षा का दीप जगाने का हमारा छोटा-सा मिशन पूरे जोश में था। नन्हे-मुन्नों के लिए चॉक-स्लेट और कुछ बिस्कुट लेकर मैं घर से निकला तो चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी। कारण भी था—कल मेरे अग्रज द्वारा आयोजित बन्द पूरी तरह सफल रहा था। अख़बारों के पन्ने उसी खबर से सजे थे और घर का माहौल सुबह से उसी चर्चा में डूबा था।

अपने परिचित क्षेत्र में पहुँचा तो नज़र नन्हें ननकू पर टिक गई। वह सूनी सड़क को टकटकी लगाए देखे जा रहा था।
“अरे ननकू! क्या देख रहे हो? चलो, पढ़ाई का समय हो गया है।” मैंने पुकारा।ननकू ने बिना आँखें हटाए धीमे स्वर में कहा—
“हमका भूख लागल बा।”

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“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.

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