“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.
रिश्तों पर असर
स्क्रीन बातचीत और संवेदनशील संवाद को कम कर देती है.
परिवार के साथ खेल, कहानियाँ और यादें साझा करने जैसे मौके छिन जाते हैं.
हमारी संचार क्षमता कमजोर होने लगती है, हम खुलकर बात करने के बजाय इमोजी और छोटे संदेशों तक सीमित हो जाते हैं.
गैर-मौखिक संकेतों का नुकसान
रिश्ते केवल शब्दों से नहीं बनते. आंखों का संपर्क, चेहरे के भाव और हाव-भाव हमें भावनाओं को समझने में मदद करते हैं. स्क्रीन में उलझे रहने से ये संकेत धीरे-धीरे गायब हो जाते हैं और रिश्तों की गर्मजोशी कम हो जाती है.
समाधान क्या है?
नो-फोन ज़ोन बनाइए जैसे खाने की मेज पर फोन का प्रयोग न हो.
फैमिली टाइम को प्राथमिकता दें रोज़ कुछ समय केवल परिवार के लिए तय करें.
ऑ़फलाइन गतिविधियाँ अपनाएँ साथ बैठकर खेल खेलें, घूमने जाएँ या पुरानी बातें साझा करें.
डिजिटल संतुलन बनाएँ स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के लिए डिजिटल वेलनेस टूल्स का उपयोग करें.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव न्यूज नेटवर्क, पुणे

2 thoughts on ““साथ होकर भी दूर”

  1. स्क्रीन बातचीत और संवेदनशील संवाद को कम कर देती है , बहुत सही है ।
    साथ मिलकर घूमने जाना
    बच्चों से बातचीत , साथ खान – पान , कहानियाँ किताबों से पढ़ना , सुनना , उनपर अपने विचार-विमर्श करना अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं ।
    बच्चों को ज्यादा महत्व देना उनके उचित विकास
    में बहुत सहायक सिद्ध होता है।

  2. स्क्रीन बातचीत और संवेदनशील संवाद को कम कर देती है , बहुत सही है ।
    साथ मिलकर घूमने जाना
    बच्चों से बातचीत , साथ खान – पान , कहानियाँ किताबों से पढ़ना , सुनना , उनपर अपने विचार-विमर्श करना अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं ।
    बच्चों को ज्यादा महत्व देना उनके उचित विकास
    में बहुत सहायक सिद्ध होता है।
    बहुत सामयिक लेखन

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