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बचपन की दीवाली : यादों की मिठास

बचपन की दीवाली में हर चीज़ में मज़ा और उत्साह होता था—धूप में फूलते गद्दे, मम्मी-चाची का त्योहार नाश्ता, और पापा का हाथ का फ्रूट क्रीम। आज की सुविधाओं के बावजूद वह मासूमियत और उत्सुकता कहीं खो सी गई है, लेकिन यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहती हैं।

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“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.

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