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दिल की भाषा

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि दिल और दिमाग का मिलन, आपसी तालमेल और संस्कृति का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भाषा न होकर भी हर व्यक्ति के भीतर निकलने वाली आवाज़ है, मौखिक और लिखित संचार का जरिया है। नए ज़माने के साथ इसे भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह धरोहर है जिसे संभाल कर रखना आवश्यक है।

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“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.

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