Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

समय की तरह पुरुष…

औरतें अपने पुरुषों के समय का बहुत ख्याल रखती हैं। लेकिन अगर सच में ख्याल रखना है, तो जरा ‘समय’ नामक पुरुष का पीछा करके देखो—आखिर यह समय कहाँ जा रहा है? क्या तुम इसे रोक पाओगी, अपनी जुल्फों में, या कोमल त्वचा पर, या आंखों की चमक और घुटनों की ताकत पर? नहीं, रोक नहीं पाओगी।तो फिर क्यों उलझती हो पुरुष के साथ? समय की तरह ही पुरुष भी है—तेरा है तो रहेगा, नहीं है तो चला जाएगा।

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रिश्ते आईसीयू में …

आईसीयू के दरवाज़े से आती बीप-बीप की आवाज़ रिश्तों की बची-खुची संवेदनाओं पर अंतिम प्रहार कर रही थी। अस्पताल की मशीनें बस शरीर को खींच रही थीं, और बाहर घरवाले—इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के स्मार्ट पैकेज में रिश्तों का अंतिम संस्कार तय कर रहे थे।”

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“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.

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