
सुनीता मलिक सोलंकी ‘मीना’ प्रसिद्ध साहित्यकार
अपने पुरुषों के समय का
बहुत ख्याल रखती हैं
औरतें!
अगर ख्याल ही रखना है तो
जरा!
‘समय’ नामक पुरूष
का पीछा कर बतायें तो सही ! कि-
आखिर ये समय जा कहाँ रहा है!
चला कहाँ जाता है क्या पकड़ पाओगी रोक सकोगी ?
अपनी जुल्फों में समय को?
या लाल लाल रूखसारों पर
या बिन झुर्री की कोरों पर ?
या घुटनों की ताकत पर
या आंखो की चमक पर
रोक सकोगी ‘समय’ को
वहीं का वहीं…
जहां जैसा यह तब था ….
जब तुम्हें तुम्हारा रूप
पसन्द था!
नहीं ना….
नहीं रोक पाओगी ना?
तो फिर क्यूँ उलझ पुलझ
होती हो पुरूष से …
वक्त की तरह ही है पुरूष
तेरा है तो रहेगा
नही है तो चला जाएगा!!

पुरुष की छवि समय में
धन्यवाद
Bohot sundar !
बहुत बढ़िया कविता
अच्छी कविता
वाह! बेहद विचारणीय रचना
समय का बीतना निश्चित है तो किसी भी विधि से
वह रोके न रुकेगा । यही स्थिति किसी भी पुरुष की भी होती है ।
आपकी कविता के निम्न वाक्य , मन को शाश्वत कठोर सत्य से परिचित करते हैं …
रोक सकोगी ‘समय’ को
वहीं का वहीं…
जहां जैसा यह तब था ….
जब तुम्हें तुम्हारा रूप
पसन्द था!
नहीं ना….
नहीं रोक पाओगी ना?