Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

समय की तरह पुरुष…

औरतें अपने पुरुषों के समय का बहुत ख्याल रखती हैं। लेकिन अगर सच में ख्याल रखना है, तो जरा ‘समय’ नामक पुरुष का पीछा करके देखो—आखिर यह समय कहाँ जा रहा है? क्या तुम इसे रोक पाओगी, अपनी जुल्फों में, या कोमल त्वचा पर, या आंखों की चमक और घुटनों की ताकत पर? नहीं, रोक नहीं पाओगी।तो फिर क्यों उलझती हो पुरुष के साथ? समय की तरह ही पुरुष भी है—तेरा है तो रहेगा, नहीं है तो चला जाएगा।

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एक प्रतीक्षा…

यह कविता जीवन में प्रतीक्षा की गहराई को उजागर करती है। इसमें मनुष्य के उस भाव को चित्रित किया गया है जहाँ वह प्रकृति या ईश्वर की अदृश्य उपस्थिति को महसूस करता है—एक ऐसा विश्वास जो जीवन को समेटता है, उसे संपूर्णता देता है। प्रतीक्षा केवल किसी घटना की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनाओं, विरासत की प्रतिध्वनियों और जीने के अनगिनत रंगों की है। यह प्रतीक्षा जीवन की हर ध्वनि, रूप, पहचान और संबंध को आत्मसात करने की है, जिसमें प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अंश समाहित हो। कविता कहती है कि सच्ची प्रतीक्षा वही है, जिसमें जीवन और ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अहसास जुड़ा हो।

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अहसासों के कतरन…

हम अपने आप में बस एक पानी की बूँद जैसे हैं। कभी मिट्टी पर गिरकर उसमें समा जाते हैं, तो कभी किसी पत्ते पर टिककर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। और जब लहरों से मिलते हैं, तो खुद सागर का रूप ले लेते हैं। हमारी पहचान इस पर नहीं है कि हम कौन हैं, बल्कि इस पर है कि हम किससे जुड़ते हैं।

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