नन्ही रोशनी…

“वह छोटी सी बच्ची बिना कुछ कहे मुझे व्यवस्थित रहना सिखा रही थी।कभी माँ जैसी समझाती, कभी दोस्त सी हँसी बिखेरती, और कभी बेटी सी बाँहों में समा जाती। शायद नन्ही मेरे जीवन में भगवान की भेजी हुई वो रोशनी थी,जिसने मेरी तन्हाई को घर बना दिया।”

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समय की तरह पुरुष…

औरतें अपने पुरुषों के समय का बहुत ख्याल रखती हैं। लेकिन अगर सच में ख्याल रखना है, तो जरा ‘समय’ नामक पुरुष का पीछा करके देखो—आखिर यह समय कहाँ जा रहा है? क्या तुम इसे रोक पाओगी, अपनी जुल्फों में, या कोमल त्वचा पर, या आंखों की चमक और घुटनों की ताकत पर? नहीं, रोक नहीं पाओगी।तो फिर क्यों उलझती हो पुरुष के साथ? समय की तरह ही पुरुष भी है—तेरा है तो रहेगा, नहीं है तो चला जाएगा।

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सागर और मन

सागर और मन का रिश्ता गहरा है। जब चाँद की छाँव में ऊँची तरंगें उठती हैं, तो उनका झिलमिलाना किसी स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। लहरें आकाश को छूने की चाह में उमड़ती हैं, लेकिन अंततः अपने ठिकाने पर लौटकर शांत हो जाती हैं।

सागर ने समय के प्रवाह से यही सीखा है—हर क्षण, हर रंग बदलता रहता है। कभी वह मचलता है, तो कभी थमकर भीतर के बुझते-सुलगते अलाव को सँजोए रहता है। चाँदनी की चादर में ढकी लहरें रात की खामोशी में खो जाती हैं। वे कभी सौम्य स्वर बनती हैं, तो कभी प्रबल गूँज की तरह उभरती हैं।

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