चलो चलते हैं, चलते हैं, चलते हैं,
यूँ ही कुछ दूर चलते हैं।
अधूरे ख़्वाब ही अक्सर उमर भर साथ चलते हैं।
सुनो, ये दिल है न डेरा है मुसाफ़िर का,
कभी आए, कभी ठहरे, कभी फिर दूर चलते हैं।
सोचती हूँ कि बोलूँगी, राज सारे ही खोलूँगी,
मगर ये फ़ोन दुश्मन है, ऐन मौके पे कटते हैं।
कभी जब पूछ लेता है वो हँसकर हाल-ए-दिल मेरा,
तभी मन के गुलिस्ताँ में हज़ारों फूल खिलते हैं।
अभी मन-मथक* सोया है, जगा मत चाँदनी उसको,
भले झूठे सही हैं ख़्वाब, पर आँखों में पलते हैं।
बिछा लो फ़र्श पर नीती-ख़यालों की हँसी चादर,
के तकिए बाहों में भरकर, समय के पार चलते हैं।

