
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज पुणे
दोस्ती का नाम अजीर्जुरहमान: एक शख्स, कई पहचान, और 25 साल का साथ
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनका कोई औपचारिक नाम नहीं होता, लेकिन उनकी गहराई हर रिश्ते से ज्यादा होती है। मेरे लिए ऐसा ही एक रिश्ता है – अजीर्जुरहमान से।
कभी भाईसाहब, कभी भाईजान, और कभी सिर्फ यार। इस नाम को लिखना जितना कठिन है, उतना ही गहरा इसका अर्थ भी है। मैंने कभी इसका शाब्दिक अर्थ खोजने की कोशिश की तो जो अर्थ सामने आया वह था – “अल्लाह का तोहफा”।सच पूछिए तो मेरे लिए भी भाईजान किसी तोहफे से कम नहीं हैं।हमारी दोस्ती कोई आज की नहीं, करीब पच्चीस साल से भी ज्यादा पुरानी है। इतने लंबे समय में इस दोस्ती पर कई बार वक्त की धूल जमी, कभी जंग भी लगी। लेकिन हर बार हमने उसे रेजमाल से घिसकर फिर चमका लिया। कभी मैंने कोशिश की, कभी भाईजान ने।
और हर बार यह दोस्ती पहले से ज्यादा चमक कर सामने आई। भाईजान सिर्फ दोस्त ही नहीं, बल्कि साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में मेरे लिए प्रेरणा भी रहे हैं। वे पढ़ने-लिखने वाले इंसान हैं और मैं भी। पत्रकारिता में उनकी दबंग शैली और बेबाक नेतृत्व हमेशा मुझे प्रभावित करता रहा है। जीवन में मैंने उनसे दो सबसे बड़ी बातें सीखी हैं .
बिना लाग-लपेट के सीधी बात करना हालात से समझौता न करना वे अक्सर कहते थे-“शेर भूखा मर सकता है, लेकिन घास नहीं खा सकता।”उनकी यही फितरत उन्हें सबसे अलग बनाती है।
एक छोटी सी बात आज भी याद है।जब हम दोनों सस्ती सिगरेट पीते थे, तब भी भाईजान सिर्फ विल्स ही पीते थे।
मुफलिसी के दिनों में भी उनकी पसंद वही रही। महिदपुर रोड में शायद मैं एकमात्र व्यक्ति था जिससे भाईजान बेझिझक कहते थे-“सिगरेट पिला यार…”
आज उन्होंने सिगरेट छोड़ दी है।स्वास्थ्य खराब होने के बाद।लेकिन वह दौर आज भी यादों में जिंदा है। मेरे जीवन का एक बहुत भावुक प्रसंग भी उनसे जुड़ा है।जब मेरे पिता (बाबूजी) का निधन हुआ था, तब मुझे सफेद गमछा पहनाकर एक जगह बैठा दिया गया था। रोज शाम को लोग सांत्वना देने आते थे।भाईजान भी रोज आते थे।उन 11 दिनों में मैं घर से बाहर नहीं निकला।एक दिन दोपहर में अचानक भाईजान आ गए।
मैंने आश्चर्य से पूछा-“भाईजान… इस वक्त?”
उन्होंने मुस्कराकर कहा -“चल यार… बाहर बहुत दिन हो गए होंगे तुझे भी सिगरेट पिए।”हम दोनों चुपचाप दिनेश कैंटीन गए और वहां बैठकर सिगरेट पीकर लौट आए।किसी को शायद यह एक मामूली घटना लगे, लेकिन मेरे लिए वह पल गहरे दुख के बीच थोड़ी सी राहत का क्षण था। यही हैं भाईजान।
दोस्ती में हमने सब कुछ देखा है-
कभी पैसे उधार लिए,
कभी लौटाए,
कभी नहीं भी लौटाए।
लेकिन दोस्ती कभी कम नहीं हुई।
समय बदला। भाईजान गांव के सरपंच बन गए।उन्होंने गांव के लिए अच्छा काम किया, कई सौगातें दिलाईं।
राजनीतिक तौर पर मैं भी भाजपा से जुड़ा रहा, और संगठन में मुझे पद दिलाने में भाईजान का भी योगदान रहा।लेकिन राजनीति में रास्ते कभी-कभी अलग भी हो जाते हैं। मेरी उठना-बैठना एक दूसरी पार्टी के मित्रों के साथ ज्यादा होने लगा।हालांकि मैं उनके किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं गया, फिर भी शायद यही कारण रहा कि मैंने पंचायत की दहलीज पर कदम नहीं रखा।
एक और वजह भी थी-भाईजान की एक आदत।
वे किसी के पीछे वही बात कहते हैं जो उसके सामने कह सकते हैं। उनकी कभी मौन स्वीकृति नहीं होती।
अगर किसी की अनुपस्थिति में उसके बारे में कुछ गलत कहा जा रहा हो तो वे उसका समर्थन नहीं करते।
उनकी यही साफगोई मुझे हमेशा पसंद भी रही और थोड़ा डर भी लगता था कि कहीं कोई बात इधर-उधर न हो जाए।
लेकिन इन सबके बावजूद भाईजान ने हमेशा मेरे और मेरे परिवार का ख्याल रखा।फिर जिंदगी की दौड़ शुरू हुई।नौकरी के कारण मैं शहर-दर-शहर भटकता रहा।इसी बीच खबर मिली कि भाईजान का स्वास्थ्य ठीक नहीं है।वे अस्पताल में भर्ती भी रहे। मैंने उनसे मिलने का वादा किया था…लेकिन जा नहीं पाया। यह बात आज भी दिल में कहीं चुभती है। भाईजान के साथ यादों का खजाना बहुत बड़ा है।अगर उन यादों को लिखना शुरू करूं तो शायद कहानी बहुत लंबी हो जाएगी।
लेकिन एक बात जरूर कहूंगा -यह यादें किसी किताब या डायरी में दर्ज नहीं हैं।
ये स्मृति पर आधारित नहीं, बल्कि जिए हुए पलों पर आधारित हैं।
और जो यादें जी ली जाती हैं,वे कभी विस्मृत नहीं होतीं।आज भी वे कैंसर के चौथी स्टेज से एक योद्धा की तरह लड़ रहे हैं उसी जिंदादिली से.. ईश्वर उन्हें लंबी उम्र प्रदान करें. वे हमेशा ताजा रहती हैं दिल में, जिंदगी में और दोस्ती के उस अनमोल रिश्ते में… जिसका नाम है -अजीर्जुरहमान… यानी मेरे भाईजान।

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