
तिरुवल्लुवर तमिलनाडु के एक महान संत, कवि और दार्शनिक थे. दूर-दूर से लोग उनसे मार्गदर्शन लेने आते. एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, गुरुजी, इतने विद्वान होने के बावजूद आप दयनीय हालत में गुजारा करते हैं. आपकी बातों से हमें क्या मिलेगा?तिरुवल्लुवर मुस्कुराए और उस व्यक्ति से पूछा क्या तुम मेरे साथ एक यात्रा पर चलोगे?
तिरुवल्लुवर उस व्यक्ति के साथ जंगल से गुजर रहे थे. रास्ते में उन्हें पेड़ के नीचे एक तपस्वी ध्यानमग्न दिखा. उसकी आँखों में अद्भुत शांति और चेहरे पर चमक थी. तिरुवल्लुवर उस तपस्वी के पास गए और कुछ समय उसके साथ बिताया.
जब दोनों वहाँ से जाने लगे, तो तिरुवल्लुवर ने व्यक्ति से कहा, तुमने उस तपस्वी को देखा, कितने संतुष्ट और सुखी लग रहे थे!
इसके बाद वे आगे बढ़े और एक महल के पास पहुँचे. वहाँ एक मंत्री तिरुवल्लुवर को बड़े आदर से नमस्कार करता है. तिरुवल्लुवर ने मंत्री से कुछ देर बातचीत की. तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद मंत्री की बातों में निराशा झलक रही थी.
संत तिरुवल्लुवर ने कहा, यह व्यक्ति मंत्री है. कोई कमी नहीं, पर उसकी आँखों में शांति और संतोष देखा?
इस संसार में कुछ लोग ज्ञान पाने में, कुछ ध्यान में लीन हैं, कुछ संपत्ति और कुछ प्रतिष्ठा पाने में लगे हैं. यही तुम्हें दिखाना चाहता था.वह व्यक्ति समझ चुका था कि असली सुख केवल धन-संपत्ति और संसाधनों में नहीं, संतोष में है.

रिंकल शर्मा, साहित्यकार, नई दिल्ली

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सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज