आत्मसंतुष्टि

बरसों बाद जब रेणू ने कलम उठाई, उसके दिल और दिमाग में अजीब सी मस्ती फैल गई। शब्दों का सागर उसके भीतर गोते लगा रहा था, और दिमाग उस सागर से मोती चुनकर उन्हें पंक्तियों में सजाने में व्यस्त था। भावनाओं की लहरें उठ रही थीं, और उसकी नाव—जो कविता का रूप धारण कर चुकी थी—उन लहरों को पार कर रही थी। हर शब्द, हर भाव उसे आत्मसंतुष्टि के द्वार तक ले गया। रेणू ने महसूस किया कि लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का साधन भी है। उसकी नाविक बनकर, वह अपनी रचनात्मकता की शक्ति को महसूस करते हुए आत्मसंतुष्टि के द्वार पर पहुँच गई।

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सूर्यास्त के समय बालकनी में साथ बैठे एक युवा पुरुष और महिला, जो विश्वास और सुकून से भरे रिश्ते का प्रतीक हैं।

अनकहा प्रेम

कुछ रिश्तों को नाम की ज़रूरत नहीं होती। वे विश्वास, अपनापन और खामोशियों की भाषा में जीते हैं। राघव और रिद्धिमा की यह कहानी ऐसे ही एक अनकहे प्रेम की दास्तान है, जहाँ शब्दों से अधिक भरोसा बोलता है।

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होली के रंगों में सराबोर दंपति, हवा में उड़ता गुलाल और पृष्ठभूमि में सुनहरी फागुन की रोशनी

देखो होली आई है…

यह कविता होली के रंगों में डूबी प्रेम और प्रतीक्षा की कथा कहती है। फागुन की पुरवाई, लाल-गुलाबी रंग और प्रियतम की स्मृतियाँ सब मिलकर विरह को और भी मधुर बना देते हैं। यह रचना उत्सव के बीच छुपी प्रेम की तड़प को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है।

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हनुमंती में देवभूमि नेत्र चिकित्सालय का नि:शुल्क नेत्र शिविर, 25 फरवरी को मोतियाबिंद ऑपरेशन

हनुमंती में ‘रोशनी’ का महाशिविर

हनुमंती में देवभूमि नेत्र चिकित्सालय द्वारा आयोजित नि:शुल्क नेत्र शिविर में ग्रामीणों को जांच, दवा और चश्मे वितरित किए गए। मोतियाबिंद मरीजों को 25 फरवरी को कोटद्वार में नि:शुल्क ऑपरेशन की तिथि दी गई।

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 हिन्दी : भारत के माथे की बिंदी 

हिन्दी हमारे जीवन का परिचय है, यह ज्ञान की अमर ज्योति है और भारत के माथे की बिंदी है। भारतीय समाज के तन, मन और जीवन में रची-बसी हिन्दी अपनेपन का सागर है। इसकी मधुर वाणी में भाषण की गूंज है और कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का समन्वय तथा सूरदास का वात्सल्य समाया हुआ है।मीराबाई का प्रेम, जायसी का वियोग और घनानंद की पीड़ा हिन्दी की संवेदनाओं में झलकती है। जयशंकर प्रसाद के आँसू, निराला का संघर्ष, पंत का परिवर्तन और महादेवी का रहस्यवाद इसमें जीवन का विस्तार पाते हैं।

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माँ की याद में लिखी गई भावनात्मक चिट्ठी दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर

मां के नाम आसुंओं से भीगी चिट्ठी

“एक पाती माँ के नाम” एक बेटी का अपनी माँ को लिखा गया हृदयविदारक पत्र है, जिसमें बिछोह, स्मृतियाँ, तन्हाई और माँ की अमिट उपस्थिति शब्दों में ढलती है। यह रचना हर उस पाठक को छूती है जिसने कभी माँ को खोया है।

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मोर मुकुट धारण किए भगवान श्रीकृष्ण, हाथ में बांसुरी, वृंदावन के कुंजों में राधा और गोपियों के साथ दिव्य रासलीला का मनमोहक दृश्य।

श्री कृष्ण

ज बिहारी श्रीकृष्ण की दिव्य महिमा, राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम और वृंदावन की रासलीला का सुंदर काव्यात्मक चित्रण। माखनचोर नंदलाल की बाल लीलाओं से लेकर उनके मनमोहक स्वरूप तक, यह कविता भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक आनंद का मधुर संदेश देती है। श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और समर्पण से ओतप्रोत यह रचना भक्तों के हृदय को भाव-विभोर कर देती है।

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डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे परिवार के सदस्य, लेकिन सभी मोबाइल में व्यस्त, पीछे अकेले बैठे बुजुर्ग।

सब साथ हैं… फिर भी अकेले

आज घरों में सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन रिश्तों में समय और अपनापन कम होता जा रहा है। यह लेख सिर्फ संयुक्त परिवारों के टूटने की नहीं, इंसानों के भीतर बढ़ते अकेलेपन की कहानी है।”

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महाकाल महालोक में भगोरिया नृत्य की प्रस्तुति

महाकाल की नगरी में लोक–आस्था का महासंगम

उज्जैन के श्री महाकाल महालोक में चल रहे महाकाल महोत्सव के दूसरे दिन भगोरिया, गोंड और बैगा लोकनृत्यों ने शिव भक्ति को जनजातीय उत्सव में बदल दिया। डमरू की गूंज, लोक-संस्कृति और सुरों ने पूरे महालोक को शिवमय कर दिया।

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संवाद

यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।

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