चीखती इंसानियत
यह कविता इंसानियत के दर्द, टूटते रिश्तों और बढ़ती नफरत की सच्चाई को उजागर करती है, लेकिन साथ ही करुणा, प्रेम और संवेदना के जरिए बदलाव की उम्मीद भी जगाती है.

यह कविता इंसानियत के दर्द, टूटते रिश्तों और बढ़ती नफरत की सच्चाई को उजागर करती है, लेकिन साथ ही करुणा, प्रेम और संवेदना के जरिए बदलाव की उम्मीद भी जगाती है.
आधुनिक समाज में गिरते मूल्यों, बढ़ती विषाक्तता, संवादहीनता और विवेक के संकट पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। साथ ही यह मूल्य आधारित पुनर्निर्माण और चेतना जागरण का आह्वान भी करता है।
2025 में मध्यप्रदेश टूरिज्म ने पीएमश्री पर्यटन वायु सेवा, हेली सेवा और रिकॉर्ड निवेश के साथ नई ऊंचाइयां हासिल कीं. 14 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे और पर्यटन विकास को नई गति मिली.
लंबी यात्राओं और थकाऊ छुट्टियों के दौर में अब पर्यटक ऐसे गंतव्यों की ओर रुख कर रहे हैं, जहाँ कम समय में ज़्यादा अनुभव मिल सके। वेटिकन सिटी से लेकर सेंट किट्स और नेविस तक, ये छोटे-छोटे देश यह साबित करते हैं कि किसी देश की पहचान उसके आकार से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गहराई से तय होती है
पुणे–मुंबई एक्सप्रेसवे पर बन रहा 13 किलोमीटर लंबा ‘मिसिंग लिंक’ केवल ट्रैफिक कम करने की परियोजना नहीं है, बल्कि इसके खुलने से पश्चिम महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली पर दूरगामी असर पड़ने की उम्मीद है। प्रस्ताव है कि यह मार्ग 1 मई, महाराष्ट्र दिवस से आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा।
यह कविता जीवन को एक रंगमंच के रूप में प्रस्तुत करती है, जहां हर व्यक्ति एक किरदार निभा रहा है। कवयित्री स्वयं को मंच पर उपस्थित बताती है, जहां वह अपने भावों, पीड़ाओं और प्रेम को खुलकर जी रही है, जबकि उसका प्रिय नेपथ्य में रहकर अपने अस्तित्व को छिपाए हुए है।
सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन में “भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेष संदर्भ में भूगोल विषय” पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर अर्पण भारद्वाज के निर्देशन में कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में भूगोल विषय के पाठ्यक्रम निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित करना है।
अनुपमा भार्गव बोलो बोलो, कुछ तो बोलो,अंतर्मन की आँखें खोलो।छाया है चहुँ ओर अँधेरा,चुप रहने से वो और गहरा हो जाएगा।सुख का सूरज न निकलेगा,दुःख गहरा होकर बढ़ जाएगा। इस धरती माँ पर सबका हक है,पशु-पक्षी और अमीर-गरीब।कुछ ने सब कुछ दबा लिया हैऔर कुछ हैं शोषित, पीड़ित।साथ सदा दो निर्बल का,खुद को सत्कर्मों से…
मन जब अतीत की ओर लौटता है तो उसे उन अधूरी इच्छाओं और अधूरे पलों का बोध होता है, जो समय की सीमाओं में बँधकर कभी साकार न हो सके। प्रेम के वे भाव, जो पूरी तरह व्यक्त होने से पहले ही ठहर गए—जैसे बादल तो आए, मन के आकाश में छा गए, पर बरसने से पहले ही थम गए। उन भावों की सुगंध, उन इच्छाओं की मासूमियत आज भी भीतर कहीं जीवित है, पर वे कभी वास्तविकता का रूप न ले सकीं।
इन्हीं स्मृतियों में यह सत्य भी उजागर होता है कि जीवन में सब कुछ पूर्ण नहीं होता। कुछ बहारें अधूरी रह जाती हैं, कुछ ऋतुएँ बिना खिले ही ढल जाती हैं। प्रेम की गहराई भी कई बार अपने संपूर्ण रूप तक नहीं पहुँच पाती। यह अधूरापन ही जीवन का हिस्सा है.
“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”