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आज भी है…

‘अर्चना अश्क मिश्रा प्रसिद्ध साहित्यकार, बोकारो

तेरी चाहत मेरे पहलु में आज भी है
तेरी जिंदगी में मैं थी न मयस्सर ,
मेरे खयालों में मयस्सर तू आज़ भी है ।

रुखसत कर देती हूॅ॑ अक्सर ,तेरी यादों को मैं ,
ख़्वाबों में वो दस्तक देती आज़ भी है ।

मुद्दतें गुज़रीं , दिन ढला ..रात बीती ,
एक ख़लिश सी सीने में आज़ भी है ।

रूबाइयों के कुछ पल मेरे लिए भी होंगे ,
दिल ये कहता अक्सर आज़ भी है ।

महफूज़ रख देती हूॅ॑ यादों को तकिए के नीचे ,
अश्कों से गीली होती रहती आज़ भी
है ।

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