अब क्या होगा
आधी रात…
तूफ़ान अपने चरम पर था और घर के भीतर एक अजीब सन्नाटा पसरा हुआ था।अचानक फोन की घंटी गूंजी और शेफाली का दिल जैसे धड़कना भूल गया। सब कुछ सामान्य लग रहा था…पर फिर भी, उसके भीतर कुछ था जो कह रहा था सब ठीक नहीं है…

आधी रात…
तूफ़ान अपने चरम पर था और घर के भीतर एक अजीब सन्नाटा पसरा हुआ था।अचानक फोन की घंटी गूंजी और शेफाली का दिल जैसे धड़कना भूल गया। सब कुछ सामान्य लग रहा था…पर फिर भी, उसके भीतर कुछ था जो कह रहा था सब ठीक नहीं है…
कुएँ के चारों ओर का घेरा टूटते ही सब कुछ शांत हो गया…लेकिन ब्लैकवुड वैली ने उन्हें छोड़ा नहीं…वो बस उन्हें अपने साथ थोड़ा-थोड़ा ले गई।अब वे जिंदा थे…पर पहले जैसे नहीं……
ब्लैकवुड वैली एक ऐसी रहस्यमयी घाटी जहाँ से लोग लौटते तो हैं, लेकिन पहले जैसे नहीं रहते। पाँच दोस्तों की एडवेंचर ट्रिप कैसे बदल जाती है डरावने अनुभव में, पढ़ें इस रोमांचक कहानी के पहले भाग में।
आँखें केवल देखने का माध्यम नहीं होतीं, वे भीतर छुपे भावों की सबसे सशक्त भाषा होती हैं। जब शब्द असहाय हो जाते हैं, तब नयन ही संवाद का कार्य संभालते हैं। कभी शिकायत, कभी शरारत, कभी विद्रोह आँखों की हर गति मन के भीतर चल रहे परिवर्तन को प्रकट कर देती है। वे मनोभावों की कुशल गुप्तचर हैं, जो बिना कुछ कहे भी सब कुछ कह जाती हैं।
सोमेश की कंपनी में नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, इसलिए अब उसे ऑफिस में ज़्यादा देर तक रुकना पड़ता था. इस बात से उसका मन खिन्न हो रहा था. दस बजे की मेट्रो से उतरकर वह ऑटो की ओर बढ़ा. जैसे ही वह ऑटो में बैठा, वैसे ही एक खुशबू का झोंका उसकी नाक से टकराया.
रुको, मुझे भी ले चलो, लगभग हांफते हुए उस लड़की ने कहा.
वो खूबसूरत चेहरा, हिरणी सी आंखें, बाल हवा में बिखरे हुए, साड़ी पहने हुए थी. कहते-कहते ही वह बैठ गई.अरे! ऐ, इन साहब ने ऑटो रुकवाया है, तुम किसी और में चली जाओ, ऑटो वाले ने डपटते हुए कहा.
“ज्ञान जब अज्ञान में डूब जाए तो टोना कहलाता है…
पर समझो तो वही औषध है, वही विद्या।” गाँव के लोग जिन शब्दों को मंत्र समझते थे, वे दरअसल उपचार थे और जिस औरत को ‘डायन’ कहा गया, वही जीवन लौटाने वाली वैद्य निकली। विश्वास और अंधविश्वास की पतली सरहद उस रात फिर धुंधली हो गई।
तेरी चाहत आज भी मेरे पहलू में जिंदा है। तू अपनी ज़िंदगी में मुझे कभी मयस्सर न हुआ, लेकिन मेरे खयालों में तू आज भी मौजूद है। मैं तेरी यादों को अक्सर रुख़सत कर देती हूँ, लेकिन वे ख्वाबों की दहलीज़ पर दस्तक देकर फिर लौट आती हैं। मुद्दतें बीत गईं, दिन ढले, रातें गुज़रीं, मगर सीने में वही खलिश आज भी बाकी है। दिल अक्सर कहता है कि रूबाइयों के कुछ पल मेरे हिस्से में भी होंगे, और मैं उन लम्हों की आस में जीती रहती हूँ। तेरी यादों को मैं तकिए के नीचे महफूज़ रख देती हूँ, मगर आँसुओं से वह तकिया आज भी भीगता रहता है।