दुनिया की दुनियादारी
यह कविता उस इंसान की आवाज़ है जो झूठ और स्वार्थ से भरी दुनिया में भी सच, संवेदना और इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश करता है। तन्हाई, संघर्ष और उम्मीद के बीच जीवन का सच्चा चेहरा दिखाती एक मार्मिक रचना।

यह कविता उस इंसान की आवाज़ है जो झूठ और स्वार्थ से भरी दुनिया में भी सच, संवेदना और इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश करता है। तन्हाई, संघर्ष और उम्मीद के बीच जीवन का सच्चा चेहरा दिखाती एक मार्मिक रचना।
“मैं भी मनुष्य हूँ” कविता तीसरे लिंग के अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह रचना समाज से स्वीकार्यता और समानता की मांग करते हुए मानवीय संवेदनाओं को गहराई से उजागर करती है।
सावन की बदली, भीगी पलकें, कोयल की कूक और मन में उतरती प्रेम की याद. ‘मन अमराई महकी रे’ रिश्तों, प्रकृति और प्रीत के मधुर एहसासों से सजी भावपूर्ण हिंदी कविता है.
माँ दुर्गा के आगमन और नवरात्रि के उत्सव का सुंदर चित्रण करती है। कवि ने माँ के नौ रूपों के वास, भक्ति और श्रद्धा के भाव, तथा उनके दुष्टों के नाश करने वाले रूप का वर्णन किया है। भक्त अपनी विपत्तियों और संकटों में माँ के सामने आता है, उनका उद्धार माँ से आशा करता है। माँ का रूप लाल चुनर, मुकुट और त्रिशूल के साथ दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है, और उनकी ममता और करुणा हर भूल और त्रुटि को क्षमा करने वाली प्रतीत होती है। भक्तों द्वारा हलवा-पूरी और चना जैसे भोग अर्पित किए जाते हैं, और वे माँ से आशीर्वाद की कामना करते हैं। पूरी कविता में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का वातावरण स्पष्ट है, जो संसार को माँ के प्रति प्रेम और सम्मान से मोहित करता है।
84 साल की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। उम्रभर की लड़ाइयाँ जीतने वाला इंसान अंतिम पड़ाव पर इतना टूट जाता है कि जीवन ही बोझ बन जाए, यह हमारे समाज और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
यह ग़ज़ल इंसानी समझ, रिश्तों की पेचीदगियों, आत्मसम्मान और देशप्रेम के सूक्ष्म भावों को बेहद नफ़ासत से पिरोती है। कभी दुनिया की चालाकियों पर तीखा सवाल उठाती है, तो कभी अपने ही घावों को मरहम की तरह सँभाल लेने का सलीका दिखाती है। इश्क़ की कोमल धड़कनों से लेकर हमदम और रकीब की पहचान तक हर शेर एक अलग दुनिया खोलता है। अंतिम शेर ग़ज़ल को असाधारण ऊँचाई देता है, जहाँ धर्म से ऊपर उठकर वतन को सर्वोपरि माना गया है। यह सिर्फ शायरी नहीं, जीवन के अनुभवों की तराशी हुई सच्चाई है।
जब देवी कामाख्या होती हैं रजस्वला : कामाख्या मंदिर की अनोखी परंपरा रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) भारत की सांस्कृतिक विविधता में अनेक ऐसे पर्व और मेले हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण दुनिया भर का ध्यान आकर्षित करते हैं। असम के गुवाहाटी स्थित पवित्र कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला ऐसा…
जरा जरा तू हमसे मिल, तनिक तनिक उतर मेरे दिल…” यह कविता प्रेम के उन कोमल एहसासों को छूती है, जहाँ शब्द कम और नजरों की भाषा ज़्यादा बोलती है। मिलन की चाह, दिल की तड़प और अनकहे जज़्बातों को बेहद खूबसूरती से पिरोती यह रचना पाठक के मन में एक मधुर रोमांटिक लहर जगा देती है।
कुछ भाव ऐसे होते हैं जो शब्दों में नहीं ढल पाते, लेकिन सावन की पहली बारिश उन्हें आवाज़ दे देती है। “सावन को आने दो” ऐसी ही एक भावुक कविता है, जहाँ अनकहे जज़्बात बादलों के साथ उमड़ते हैं, बारिश की हर बूंद प्रेम का संदेश बन जाती है और मन किसी अपने की प्रतीक्षा में भीग उठता है। यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और मानसून की मधुर अनुभूतियों को बेहद संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।
यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।
वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।