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बड़ा बैनजी- श्यामलता शर्मा

बड़ा बैनजी श्यामलता शर्मा: एक युग का अंत श्यामलता शर्मा

एक रोशनदान, जो घर-आंगन ही नहीं, पीढ़ियों को रोशन कर गया

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

महिदपुर रोड की 95 वर्षीय वयोवृद्ध सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती श्यामलता शर्मा का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक युग का विदा होना है। जिन्हें पूरा क्षेत्र प्यार से “बड़ा बैनजी” कहकर पुकारता था, वे सच में अपने नाम की तरह बड़ी थीं—दिल से, विचारों से और कर्म से।

मुझे चार वर्षों तक उनका सान्निध्य मिला, जब वे कसारी में शिक्षिका थीं। उस समय गांव में लड़कियों की पढ़ाई पांचवीं तक ही सीमित थी। छठी से आठवीं तक लड़कों के साथ पढ़ना पड़ता था, और इसी झिझक में कई माता-पिता बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते थे। पर बैनजी हार मानने वालों में से नहीं थीं। वे घर-घर जाकर समझातीं“लड़की पढ़ेगी तो घर-परिवार और समाज दोनों आगे बढ़ेंगे।” उनके प्रयासों से कई बेटियां आगे बढ़ीं, महिदपुर रोड के हायर सेकेंडरी स्कूल में प्रवेश लिया और नौकरियां हासिल कर अपने पैरों पर खड़ी हुईं।

वे जितनी खुशमिजाज थीं, उतनी ही बेबाक भी। एक बार मेरी नई प्रिंटेड शर्ट देखकर हंसते हुए बोलीं “सूरया, (वे अक्सर मुझे प्यार से सुरेश की सूरया ही बोलती थी).. थारो भुसट देख के म्हारा दांत चालिरिया, बंजारा जैसो लागिरियो और फिर उनकी वही खिलखिलाती हंसी… आज भी कानों में गूंजती है।स्कूल के बाद वे गांव में किसी की तबीयत पूछतीं, किसी को देसी नुस्खा बतातीं, तो कभी स्वादिष्ट रेसिपी ऐसे सुनातीं कि सुनते-सुनते ही मुंह में पानी आ जाए। गांव वाले भी उन्हें खेतों से ताजी सब्जियां, हरे चने, बेर, अमरूद, भुट्टे भेंट करते यह उनका सम्मान था, प्रेम था।

पांच बेटों और दो बेटियों के भरे-पूरे परिवार की मुखिया होकर भी वे अंत तक सक्रिय रहीं। पति और दो बेटों के असामयिक निधन का असहनीय दुःख झेलकर भी उन्होंने कभी जीवन से हार नहीं मानी।वे सचमुच एक रोशनदान थीं जिससे आती हुई प्रकाश की पतली-सी किरण पूरे घर, परिवार और समाज को उजाला देती रही। आज वह रोशनदान बंद हो गया है, पर उसकी रोशनी हमारी यादों में हमेशा जगमगाती रहेगी।
उनका जाना अपूरणीय क्षति है। आंखें नम हैं, दिल भारी है… पर गर्व भी है कि हमें “बड़ा बैनजी” का सान्निध्य मिला। उनकी स्मृतियां ही अब हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं।

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