नारी

एक आत्मविश्वासी भारतीय महिला खुले आकाश के नीचे खड़ी है, एक हाथ में किताब और दूसरे में तलवार का प्रतीकात्मक रूप, चेहरे पर दृढ़ता और गरिमा का भाव।

रचना प्रतियोगिता के लिए नामिनेट है, कृपया अपनी राय इस पर जरूर दें. आपकी राय के अनुरूप पैनल निर्णय करेगा.

विजयलक्ष्मी सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ

नारी, तुम श्रेष्ठ हो, पूजनीय हो।
तुम साहस हो, तुम संबल हो।
तुम जगत-जननी एवं जन्माधार हो,
तुम हर पल सतर्क हो, विनम्र हो।

शालीन हो, मृदुल हो, दो कुलों की शान हो,
स्वयं में तुम अपनी गरिमामयी पहचान हो।
गुणों की खान, विश्व के लिए वरदान हो,
तुम्हीं ने नर को जन्म दिया अहो!

तुम धरती पर स्वर्ग हो,
तुम्हारे चरणों में शत-शत प्रणाम हो।
हर संघर्ष करने और सहने में माहिर हो,
माँ, बहन, बेटी सम्माननीय तुम हो।

अपनी रक्षा, शिक्षा व विज्ञान में अग्रगणी हो,
ज़मीन से आसमान तक उड़ानों में बेहतरीन हो।
तुम श्रद्धा हो, तुम पूजा और अर्चना हो,
रसोई में व्यंजन, बाँहों में खंजर हो।

आँख न दिखा सके कोई तुम ऐसी चरित्रवान हो,
तुमसे प्रेरित विश्व व सम्पूर्ण जहान हो।
खुद में सम्पूर्ण हो, सम्पूर्णता ही जनती हो,
विदुषी, तुम समर्पित विश्व का सम्मान हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *