शब्द मेरे भाव मेरे

उमड़ते भावों को
शब्दों में उकेरना
न जाने यह शौक !
कब और कैसे पनप गया
नन्हा पौधा था जो
अब वृक्ष बन गया
कुछ तो बचपन से ही था
प्रकृति का सान्निध्य मिला
स्वयं ही हरा-भरा हो गया
पानी के स्पर्श मात्र से ही
खूब फल-फूल गया
उर्वरा के सान्निध्य में
दोगुना हो गया
मानों इच्छाओं को
खुला आकाश मिल गया।

निरुपमा सिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, बिजनौर

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