शब्दों से सपनों तक का सफर
बचपन से शब्दों से जुड़ी लेखिका ने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी रचनात्मक पहचान बनाई. ‘कुमकुम लगे पाँव’ उनके साहित्यिक सफर और स्त्री जीवन के विविध रंगों की संवेदनशील अभिव्यक्ति है.

बचपन से शब्दों से जुड़ी लेखिका ने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी रचनात्मक पहचान बनाई. ‘कुमकुम लगे पाँव’ उनके साहित्यिक सफर और स्त्री जीवन के विविध रंगों की संवेदनशील अभिव्यक्ति है.
पुणे के सामाजिक उद्यमी प्रदीप लोखंडे ने पोस्टकार्ड और पुस्तकों के माध्यम से ग्रामीण भारत में पढ़ने की संस्कृति विकसित की और लाखों बच्चों का भविष्य बदला।
“ख़्वाब बुनती रात” एक संवेदनशील कविता है, जो रात के सन्नाटे में जन्म लेती भावनाओं, सपनों और कल्पनाओं को शब्दों में ढालती है। यह कविता दिल और ज़ेहन के बीच चल रहे अनकहे संवाद को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत करती है।
कलाश्री संगीत मंडल द्वारा आयोजित ‘नामाचा गजर’ कार्यक्रम 6 जुलाई को एरंडवणे स्थित शकुंतला शेट्टी सभागृह में आयोजित किया जाएगा। पं. रघुनाथ खंडाळकर अपने पुत्रों के साथ प्रस्तुति देंगे, साथ ही पं. भीमसेन जोशी के पुत्र श्रीनिवास जोशी और पोते विराज जोशी भी मंच पर नजर आएंगे।
मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…
चरैवेति – चलना मनुष्य का धर्म है। घुमक्कड़ी केवल यात्रा नहीं, बल्कि जिज्ञासा, अनुभव और आत्मशक्ति का मार्ग है। आदिम मनुष्य से लेकर आधुनिक घुमक्कड़ों तक, हर कदम हमें प्रकृति, समाज और संस्कृति से जोड़ता है। यही जिज्ञासा हमें नई कल्पनाओं और अंतहीन संभावनाओं की ओर ले जाती है।”
छिन चुकी थीं एक छत, जो बँटवारे की भेंट चढ़ गई थी और मजबूरी में बेचनी पड़ी थी।
वैसे तो सविता को ज़मीन-जायदाद से कोई मोह नहीं था, लेकिन एक रहने को घर तो चाहिए ही था — जो अपना होता। पर जमीनी लालची अपनों ने ही उसका घर छीन लिया था। कानूनी दांव-पेंच में सविता को अपनी पतंग काटने में बरसों लग गए।
जीवन बिखरे तिनकों को समेटने में बीत रहा था। ख्वाहिशों की आग भी अब मध्यम हो चुकी थी।
विद्यालय के बाहर छोटी-सी दुकान लगाए बैठी चूरन वाली चाची जी बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक हैं। झरबेरी के रंग-बिरंगे बेर, गुड़ वाली लाल इमली, संतरे वाला कम्पट और नमक लगा कमर उनका हर स्वाद मानो बचपन की जेब में छुपी खुशी जैसा। न दिखावा, न चालाकी बस सादगी, अपनापन और शुद्ध स्वाद का भरोसा। सच में, पूरे दिल से भोली-भाली थीं चूरन वाली चाची जी।
यह लेख एक ऐसी वृंदावन यात्रा का वर्णन करता है, जो केवल स्थान परिवर्तन नहीं बल्कि आत्मा से संवाद बन गई। बाँके बिहारी मंदिर के दर्शन, बरसाना की अनुभूति और यमुना तट की शांति ने इसे एक दिव्य अनुभव बना दिया।
मैं नारी हूँ, पर अबला नहीं। मेरे आँसुओं में कमजोरी नहीं है, बल्कि वह आग है जो सबको झुलसा सकती है। नारी ईश्वर की अनुपम रचना है। वह घर-आँगन और खेत-खलिहान में गीतों की तरह झूमती है। ममता की गागर और जीवन की धारा उसकी आत्मा में प्रवाहित हैं। वह सृजन की मिट्टी से गढ़ी गई और करुणा से सींची गई है।
फिर भी, कभी उसे भोग्या बना दिया गया, कभी जायदाद समझा गया, और कभी बंधनों में बाँध दिया गया। लेकिन वही नारी मातृशक्ति बनी, महिषासुर का वध किया और अपने परिवार की रक्षा करती रही। अब वह निर्भीक होकर खड़ी है, अन्याय से डरती नहीं और चुनौतियों का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को आज़ाद कराती है। स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नारी नवयुग का स्वर्णिम आगाज़ है।