पितरों के तर्पण के लिए उज्जैन में उमड़ी आस्था
पितृपक्ष शुरू होते ही उज्जैन के सिद्धवट और गयाकोठा पर तर्पण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ पहुंची। पूर्णिमा तिथि पर सुबह से दोपहर तक धार्मिक अनुष्ठान चलते रहे।

पितृपक्ष शुरू होते ही उज्जैन के सिद्धवट और गयाकोठा पर तर्पण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ पहुंची। पूर्णिमा तिथि पर सुबह से दोपहर तक धार्मिक अनुष्ठान चलते रहे।
वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में यात्रियों को विमान जैसी लग्जरी और आधुनिक सुविधाओं का अनुभव देने की तैयारी है। दिसंबर में पहले प्रोटोटाइप का परीक्षण प्रस्तावित है। जानिए 14,400 करोड़ रुपये की परियोजना, लातूर में कोच निर्माण और ट्रेन की खास सुविधाओं के बारे में।
पितृपक्ष अपने दिवंगत पूर्वजों के स्मरण और सम्मान का समय माना जाता है। इस दौरान तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है। जानिए इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ।
एक वास्तुविद् जब घर के वास्तुदोष की तलाश में पहुँचते हैं, तो उन्हें वहाँ कुछ ऐसा दिखाई देता है जो किसी भी वास्तु-नियम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—परिवार का प्रेम, सम्मान और आपसी मेल।
वो तक़दीर नहीं है मेरी, फिर भी उसको प्यार से सँवारूँ मैं… अधूरी मोहब्बत की यही कशमकश इस कविता को एक अलग भाव देती है।
माँ केवल घर में मौजूद एक रिश्ता नहीं, बल्कि घर-आँगन की हर स्मृति और हर दुआ में बसी एक भावना है। यह कविता माँ की ममता और अपनेपन को शब्द देती है।
स्त्री और पुरुष की दो विरोधी दुनियाओं के बीच शोषण, हिंसा और असमानता की कड़वी सच्चाई को उजागर करती यह कविता धार्मिक दंगों, पारिवारिक हिंसा, सामाजिक भेदभाव और स्त्री की देह पर होने वाले अत्याचारों पर तीखा सवाल उठाती है.
कभी मन बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे मौन रहने पर मजबूर कर देती हैं। ‘कहा अनकहा, सुना अनसुना’ इसी मौन, दूरी और अनकही भावनाओं की अभिव्यक्ति है।
तेरे चेहरे का नूर नहीं केवल, तेरे होने की रोशनी है। यह कविता उस प्रेम की कहानी है, जिसमें रूप से अधिक रूह और साथ की अहमियत होती है।