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युद्ध की विभीषिका

युद्ध के बाद तबाही का दृश्य, युद्ध के बाद तबाही का दृश्य,

अर्चना वर्मा सिंह, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई

युद्ध की विभीषिका को जानते हैं सब यहाँ
कृत्य यह पाप है पर मानते हैं कब कहाँ‌।

क्या इन्हें पड़ी यहाँ जिए कोई मरे कोई
है गुनाह और का ये दंड पर सहे कोई।

रक्त जो लगा हो हाथ चैन कब ही आता है
मानते है जब तलक ये वक़्त बीत जाता है।

काल के कुचक्र से तो बच न कोई पाया है
कष्ट और पीड़ा ले के इस जहां से जाता है।

यह न सोचिए कभी कि आह बोलती नहीं
बोलती हैं एक दिन ये पीछा छोड़ती नहीं।

साथ ले के आए क्या है साथ क्या ही जाना है
तथ्य जानते हैं सब ये किसने पर ये माना है।

इस गुनाह के कसूरवार हम नहीं है क्या
देखते हैं मुक बन के हम में दम नहीं है क्या।

चुप्पी तोड़ो हौसलों से ही उठा उफान है
ज़िंदा लाश हम नहीं है हम में बाक़ी जान हैं।

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