नन्ही रोशनी…
“वह छोटी सी बच्ची बिना कुछ कहे मुझे व्यवस्थित रहना सिखा रही थी।कभी माँ जैसी समझाती, कभी दोस्त सी हँसी बिखेरती, और कभी बेटी सी बाँहों में समा जाती। शायद नन्ही मेरे जीवन में भगवान की भेजी हुई वो रोशनी थी,जिसने मेरी तन्हाई को घर बना दिया।”

“वह छोटी सी बच्ची बिना कुछ कहे मुझे व्यवस्थित रहना सिखा रही थी।कभी माँ जैसी समझाती, कभी दोस्त सी हँसी बिखेरती, और कभी बेटी सी बाँहों में समा जाती। शायद नन्ही मेरे जीवन में भगवान की भेजी हुई वो रोशनी थी,जिसने मेरी तन्हाई को घर बना दिया।”
राम भक्त हनुमान पर आधारित यह भावपूर्ण हिंदी कविता उनकी भक्ति, शक्ति और संकट मोचन स्वरूप का सुंदर वर्णन करती है। पवनपुत्र की महिमा को समर्पित यह रचना आस्था और श्रद्धा से भर देती है।
पुणे के सामाजिक उद्यमी प्रदीप लोखंडे ने पोस्टकार्ड और पुस्तकों के माध्यम से ग्रामीण भारत में पढ़ने की संस्कृति विकसित की और लाखों बच्चों का भविष्य बदला।
साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि संवेदनाओं, संघर्षों और समाज को नई दिशा देने का माध्यम है। शिक्षिका, साहित्यकार और राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की संस्थापिका डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ ने अपनी लेखनी को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं बनाया, बल्कि इसे नई प्रतिभाओं को पहचान दिलाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का मिशन बनाया है। इस विशेष बातचीत में उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा, चुनौतियों, पुरस्कारों, डिजिटल युग में साहित्य की बदलती तस्वीर और युवा रचनाकारों के लिए अपने प्रेरक संदेश को बेहद आत्मीयता के साथ साझा किया है।”
मोबाइल और वीडियो गेम से पहले हमारा बचपन माचिस की छापों और फिल्मी पोस्टरों में बसा था। छाप खेलते हुए रेल पटरियों पर खज़ाना ढूँढना, रेयर माचिस पर रौब दिखाना और फिर ताश जैसे पत्तों में दांव लगाना“श्रीदेवी चश्मे में!”ये सिर्फ़ शब्द नहीं, पूरे दौर की धड़कन थे। वह खेल बिना पैसों का था, पर यादों से भरपूर।
कुछ लोग नज़रों से दूर हो जाते हैं, मगर दिल से नहीं। यह कविता उसी विरह, स्मृति और लौट आने की उम्मीद का गीत है, जहाँ प्रेम जुदाई के बाद भी सांस लेता रहता है।
“एक नायाब संदूक” केवल एक कविता नहीं, बल्कि स्मृतियों का ऐसा कोमल संसार है, जहाँ बचपन की शरारतें, यौवन के सपने और माँ का स्नेह एक साथ सिमट आते हैं। इस कविता में संदूक एक प्रतीक बनकर उभरता है वह स्थान जहाँ जीवन के सबसे अनमोल क्षण सुरक्षित रहते हैं।
“स्मृति नाद” अपूर्वा की ऐसी काव्य कृति है, जो स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं के गहरे संसार को सजीव करती है। इसमें मां, पिता और बचपन से जुड़ी अनुभूतियां इतनी सजीव हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें जीने लगता है।
डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन चुका है, लेकिन सुविधा और मनोरंजन के बीच उसकी लत कब लग जाती है, कई बार हमें पता भी नहीं चलता। लंबे समय तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, नोटिफिकेशन के बारे में लगातार सोचना, फोन पास न होने पर बेचैनी ये सभी संकेत बताते हैं कि हमारा डिजिटल व्यवहार नियंत्रण से बाहर हो रहा है। समय रहते सीमाएँ तय करना और ऑफलाइन जीवन को महत्व देना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है।
भरोसा जीवन की वह डोर है, जो हमें स्वयं से लेकर दूसरों और अंततः ईश्वर तक जोड़ती है। विपरीत परिस्थितियों में जब अपने प्रयास नाकाफी पड़ जाएँ, तब किसी अपरिचित का बढ़ा हुआ हाथ ईश्वर जैसा लगता है। जीवन की यह राह आपसी विश्वास पर ही चलती है और अंत में भरोसा यही कहता है, “जो भी होगा, अच्छा ही होगा।”