डोर जो बंधी है

जब भरोसा टूटे, खुद को संभालना सीखें – एक भावुक हिंदी कहानी

अंजू निगम, प्रसिद्ध लेखिका, लखनऊ

दरवाज़ा लगातार पीटे जाने पर कनु खीझ गई।

“कौन है?” मन की खीझ आवाज़ को तल्ख़ बना गई।

“मैं हूँ, मन्नी। जल्दी खोल, बाहर बहुत गर्मी पड़ रही है।”

कनु ने दरवाज़ा खोला। मन्नी आकर पास पड़े पलंग के सिरहाने धँस गई। कनु ने उसका हाल देखा तो जल्दी से शरबत बना लाई। शरबत पकड़ाकर कनु वहीं सिरहाने की थोड़ी-सी बची जगह में खुद को टिकाने लगी। यह महसूस कर मन्नी पल्ली तरफ खिसक गई।

“तकलीफ़ होती है न, ऐसी थोड़ी-सी छूटी जगह में अपने को निभाना।”

मन्नी की इस बात पर कनु ने उसे ध्यान से देखा। मन्नी के माथे पर गाढ़े पसीने की बूंदें अब भी चिपकी थीं। आँखें एकदम सूखी, मानो रेगिस्तान उतर आया हो।

“क्या कहा पंडित जी ने?” कनु ने बातों को मोड़ दिया।

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मन्नी चेहरा उठाकर देर तक उसे देखती रही-एकटक। मानो शब्दों को एक जगह बटोर रही हो।

“कह रहे थे, अब कुछ नहीं बदलेगा। जैसा है, वैसा ही रहेगा। वह अब कभी तुम्हारी तरफ नहीं मुड़ेगा।”

“ऐसा ही होगा, तुम्हें विश्वास है?”

“सब तरफ के विश्वास की डोर तो छूट गई। तभी एक इसी तरफ का विश्वास ज़्यादा हो गया है।”

“तुम चाहो तो यह विश्वास भी तोड़ सकती हो। बस, अपने अंदर के आत्मविश्वास को जगाओ। बाकी सब बेमानी हो जाएगा।”

“तुम्हें लगता है, मैं ऐसा कर पाऊँगी? मैं बहुत हार गई हूँ।”

“क्यों करती हो ऐसा?”

कनु का यह प्रश्न मन्नी को बिंध गया।

“क्या करती हूँ? कैसा करती हूँ?” मन्नी अचकचा गई।

“यह जो अपने को कमजोर दिखाती रहती हो। इतनी कमजोर हो क्या तुम?” आज बाहर की गर्मी कनु की आवाज़ में चढ़ रही थी। “मेरे साथ कौन था? मैं भी तुम्हारी तरह कमजोर, लाचार बनी रहती. बटोरती सबकी खोखली सहानुभूतियाँ। यही चाहती हो न बस तुम?” कनु का स्वर तल्ख़ और कठोर था।

मन्नी चौंककर उसे देखती है-एकटक। इस बार फिर वह बटोर रही है, शब्दों को नहीं, अपने आप को।

“बंद करो अपने आपको बेचारा मानकर जीना। दूसरों के फेंके दया के टुकड़ों से कब तक अपने मन को बहलाती रहोगी?” कनु आज जो लावा उगल रही है, वह मन्नी के इस हद तक लाचार होकर जीने का नतीजा है।

मन्नी की ऊँची डिग्रियाँ अलमारी के कोने में सुबक रही हैं। कनु नहीं चाहती कि उसकी बहन कहीं से भी कमजोर पड़े. फिर उस आदमी के लिए क्यों, जिसने मन्नी को कभी कीमती माना ही नहीं? मन्नी तो हीरा है। उसे तराशना है तो शब्दों की कठोर चोट तो करनी ही पड़ेगी न!

मन्नी यूँ ही हतप्रभ बैठी रही। आज कनु ने उसे सहलाने की कोशिश नहीं की। मन्नी सारा समय अपने आप से लड़ती रही। क्या सब केवल तमाशा देखने के लिए उसके मर्म को छेड़ते हैं? कनु की बातें कठोर हैं, पर सच के करीब।

वह धीरे से चलकर कनु के पास आकर बैठ जाती है. “कल चलोगी मेरे साथ, मेरे पुराने स्कूल? देखूँ, मेरी जगह अब भी खाली है क्या?” कनु को लगा कि वह आत्मविश्वास की डोर, जो मन्नी के हाथों से छूट रही थी, अब उसका सिरा फिर मजबूती से पकड़ रहा है।

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