
संध्या यादव, सुप्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई
खुशनसीब प्रेमिकाएँ वो थीं,
जिनके प्रेमी ने उनके साथ
प्रेम में साथ मरने की नहीं,
बल्कि साथ जीने की कसमें खाईं…
खुशनसीब प्रेमिकाएँ वो थीं,
जिनके प्रेमी ने उन्हें
चाँद-सितारे देने के वादे नहीं किए,
बल्कि हर सुबह पहली चाय
बनाकर पिलाने का वचन दिया…
खुशनसीब प्रेमिकाएँ वो थीं,
जिनके प्रेमी ने उनका पिता
बनने की कोशिश कभी नहीं की,
बल्कि माँ बनकर हमेशा साथ रहे…
खुशनसीब प्रेमिकाएँ वो थीं,
जिनके प्रेमी बाज़ार से लौटकर
हाथ में सामान का थैला थमाते हुए
उनकी हथेलियों पर रख देते थे
मोगरे का गजरा, पति की तरह लजाते हुए…
खुशनसीब प्रेमिकाएँ वो थीं,
जिनके प्रेमी ने प्रेम के आवेग में भी
ओठों के बजाय पहले
चूमा उनका माथा…

Bahut sundar rachna
धन्यवाद सर
सुन्दर अभिव्यक्ति
सुन्दर कविता
बहुत ही प्यारी कविता 👌
सुन्दर अभिव्यक्ति