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अलका अग्रवाल “राज़” की मार्मिक ग़ज़ल

अंधेरे में खड़ा एक शख्स, दूर उगता सूरज और भावनात्मक माहौल, इश्क और दर्द का प्रतीक

अलका अग्रवाल राज, प्रसिद्ध कवयित्री, भोपाल

इश्क़ में जो भी जलने वाला है।
वोतो कुंदन में ढलने वाला है।।

नींद में कोई चलने वाला है
छत से आगे निकलने वाला है।।

ख़ौफ़ खाते हो क्यूँ अंधेरो से।
ठहरो सूरज निकलने वाला है।।

पर परिंदे के ना अभी नहीं कतरो।
अब ये घरसे निकलने वाला है।।

और छेड़ो न इश्क़ के क़िस्से।
दर्द दिल में उबल नें वाला है।।

वक़्त का तुम भरोसा मत करना।
लम्हा लम्हा बदल ने वाला है।।

खेंच ले अक्स “राज़” आँखों में।
कोई चेहरा बदल ‘ने वाला है।।
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