
अनामिका दुबे, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
विश्वास का वस्त्र
द्रौपदी-
हे माधव! उस सभा की स्मृति आज भी कंपा जाती है,
जहाँ अस्मिता नारी की, जुए में हार बताई जाती है।
भरी सभा में प्रश्न हुआ था—क्या मैं वस्तु कहलाऊँगी?
या अपमान की अग्नि में, चुपचाप यूँ ही जल जाऊँगी?
जब-जब मन यह सोचता है, हृदय विदीर्ण हो जाता है,
हर उत्तर जैसे मौन बन, भीतर ही सो जाता है।
भीष्म, द्रोण, कृप सब बैठे—नीति शास्त्र समझाते थे,
पर मेरी पीड़ा के आगे, शब्द सभी झुक जाते थे।
हे केशव! जब आँचल मेरा खींचा गया निर्दयता से,
तब क्यों ना आए तुम दौड़े, मेरी उस व्यथा व्याकुलता से?
क्या मेरी पुकार अधूरी थी, या विश्वास कहीं डगमगाया था?
या फिर यह भाग्य का लेखा था, जो मुझको ही सहना आया था?
कृष्ण–
पंचाली! तेरे हर आँसू का मुझको पूरा भान रहा,
तेरी हर पीड़ा के संग मेरा भी अंतर्मन त्रस्त रहा।
पर नियम यही इस जग का—जब तक आश्रय जग में होता,
तब तक ईश्वर भी मानव के निर्णय में ही बंधा रहता।
जब तक तूने थामा था, अपने जनों का सहारा,
मैं मौन खड़ा था देख रहा, विधि का वह विचित्र इशारा।
पर ज्यों ही तूने त्याग दिया, हर आस और हर अभिमान,
मैं बनकर तेरी शक्ति आया, बनकर असीमित वरदान।
वस्त्र नहीं था केवल वह तेरे विश्वास की डोर थी,
जो जितनी दृढ़ होती गई, उतनी ही वह अटूट हो गई।
द्रौपदी-
तो क्या यह नारी का जीवन, हर क्षण परीक्षा बन जाता है?
हर मोड़ पर उसकी मर्यादा, क्यों बार-बार तौली जाती है?
क्या शक्ति होना अभिशाप है, या यह जग की विडंबना है?
जहाँ सम्मान की रक्षक ही, अपमान की शिकार बना है?
मैं प्रश्न लिए खड़ी हूँ आज, इतिहास के उस द्वार पर,
क्या उत्तर देगा यह युग अब, नारी के अधिकार पर?
कृष्ण-
नारी केवल करुणा नहीं, वह स्वयं सृजन की धारा है,
वह शक्ति, बुद्धि, प्रेम, तपस्या—हर रूप में उजियारा है।
जिस दिन यह जग समझेगा, उसका वास्तविक सम्मान,
उस दिन मिट जाएगा हर अन्याय, हर अन्याय का अभिमान।
तेरी वेदना केवल तेरी नहीं, यह युगों की पुकार बनी,
तेरे प्रश्नों से ही जग में, चेतना की नई धार बनी।
तू रोई थी उस सभा में, पर गूँज तेरी युगों तक गई,
तेरी उस मौन पुकार से, अन्याय की नींव हिल गई।
द्रौपदी–
हे गोविंद! अब समझ पाई, पीड़ा भी एक साधना है,
जो आत्मा को तपाकर ही, उसे दिव्य बनाना है।
अब ना डर है, ना संशय है—बस विश्वास तेरा साथ है,
हर कठिनाई में अब मुझको, तेरा ही आभास है।
कृष्ण–
याद रखो हे पंचाली! जब भी अन्याय बढ़ेगा यहाँ,
कोई ना कोई द्रौपदी फिर, प्रश्न बनकर खड़ी होगी वहाँ।
और जहाँ कहीं भी सत्य, धर्म की राह दिखाएगा,
वहाँ-वहाँ मेरा सुदर्शन, अन्याय को मिटाएगा।
संघर्षों से मत घबराना, यह जीवन का श्रृंगार हैं,
जो इनसे लड़कर निखरे, वही सच्चे अवतार हैं।
मैं हर युग में, हर रूप में, तेरे संग ही आता हूँ,
बस श्रद्धा की एक पुकार हो—मैं दौड़ा चला आता हूँ।
समापन (संयुक्त):
द्रौपदी-
अब नारी अबला नहीं रही, वह जाग चुकी पहचान से,
अपने हक की लड़ाई लड़ेगी, अपने स्वाभिमान से।
कृष्ण-
और जहाँ यह स्वर गूँजेगा, वहाँ मैं भी उपस्थित हूँ,
धर्म, सत्य और प्रेम के संग-सदा तुम्हारे निकट हूँ।

सुंदर
बहुत सुंदर
जय हो