स्त्री : एक मुलाकात
‘स्त्री – एक मुलाकात’ एक मार्मिक कविता है, जो उस स्त्री की कहानी कहती है जो परिवार, बच्चों और जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते स्वयं से दूर हो जाती है। यह कविता स्त्री के त्याग, उसकी अनदेखी इच्छाओं और अपनी पहचान से पुनः मिलने की आकांक्षा को संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।
नीली जुबान….!
जामुन की नीली जुबान, बचपन की मासूम खुशियां, आईने के सामने की शरारतें और सेहत से जुड़ी अनमोल बातें यह लेख जामुन के स्वाद, यादों और उसके औषधीय गुणों को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है।
गुलमोहर और रजनीगंधा
क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या किसी की खुशबू की तरह मन में हमेशा बने रहने का एहसास? ‘गुलमोहर और रजनीगंधा के नाम’ एक रूहानी और रोमांटिक पत्र है, जो प्रेम को रंगों, खुशबू और आत्मिक जुड़ाव के माध्यम से व्यक्त करता है।
अधूरी बातें…
कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस धीरे-धीरे उनकी आवाज़ें बंद हो जाती हैं। ‘अधूरी बातें’ एक ऐसी भावुक कहानी है, जिसमें दो लोग एक-दूसरे को समझते हैं, सपनों को उड़ान देते हैं, लेकिन जीवन की राहों में कहीं बिछड़ जाते हैं। यह कहानी प्रेम, प्रतीक्षा और खामोशियों की अनकही दास्तान है।
वक्त का पहिया…
वक्त लौटकर आता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसके साथ बिछड़े लोग और बीते पल कभी वापस नहीं आते। ‘वक्त का पहिया’ समय, स्मृतियों और जीवन में आए बदलावों पर आधारित एक गहरी और भावुक हिंदी कविता है, जो पाठक को अपने अतीत से रूबरू कराती है।
पराया मायका
माँ के रहते मायका सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि प्यार, अपनापन और प्रतीक्षा का दूसरा नाम होता है। लेकिन माँ के जाने के बाद वही घर क्यों पराया-सा लगने लगता है? ‘पराया मायका’ एक ऐसी भावुक लघुकथा है, जो हर बेटी के दिल में छिपे उस खालीपन को शब्द देती है, जिसे केवल माँ की अनुपस्थिति ही पैदा कर सकती है।
सूनी आँखें
सूनी आँखें” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो वृद्ध माता-पिता के अकेलेपन, उपेक्षा और उनके मन में अपने बच्चों के प्रति अटूट प्रेम को भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त करती है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि माता-पिता की सेवा और सम्मान ही सच्चा धर्म और सबसे बड़ा मानवीय कर्तव्य है
दुनिया की दुनियादारी
यह कविता उस इंसान की आवाज़ है जो झूठ और स्वार्थ से भरी दुनिया में भी सच, संवेदना और इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश करता है। तन्हाई, संघर्ष और उम्मीद के बीच जीवन का सच्चा चेहरा दिखाती एक मार्मिक रचना।
छत वाला प्रेम
सन् 1994 का वह दौर, जब प्रेम के पास न मोबाइल था, न सोशल मीडिया। बस शाम की छतें, तिरछी निगाहें, पत्थर में बंधी चिट्ठियाँ और एक अधूरी मोहब्बत, जो बरसों बाद भी यादों की छत पर जाड़े की धूप बनकर ठहरी रहती है।
