पुणे में मैट्रिमोनियल ठगी:

खुद को इसरो वैज्ञानिक बताकर 26 लाख की ठगी

10वीं पास होने के बावजूद खुद को इसरो वैज्ञानिक बताकर मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर एक महिला से 26 लाख रुपये की ठगी करने वाले आरोपी को येरवडा पुलिस ने गिरफ्तार किया है. उसने इसी प्रकार से महिलाओं से ठगी के 11 मामले किए हैं.

आदर्श प्रशांत म्हात्रे उर्फ स्वप्नील वारुळे उर्फ हेमंत गायकर उर्फ जयेश पाटिल (उम्र 34, निवासी अलीबाग, जिला रायगढ़) ऐसा इस आरोपी का नाम है. उसे कैसीनो का शौक है और वह गोवा के एक कैसीनो का गोल्ड कार्ड सदस्य है. ठगी के 21 लाख रुपये उसने इसी कैसीनो के खाते में जमा किए थे. येरवडा पुलिस ने यह 21 लाख रुपये जब्त कर लिए हैं.

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सिंहस्थ 2028 के दौरान उज्जैन में शहर के बाहर मल्टीलेवल पार्किंग में खड़े वाहन और मेला क्षेत्र की ओर श्रद्धालुओं को ले जाती शटल बसें, व्यवस्थित ट्रैफिक और साइन एज सिस्टम के साथ.

सिंहस्थ 2028 में बदलेगा ट्रैफिक मॉडल

सिंहस्थ 2028 को लेकर प्रशासन ने इस बार ट्रैफिक प्रबंधन का पूरा खाका बदल दिया है। करीब 30 करोड़ श्रद्धालुओं के संभावित आगमन को देखते हुए शहर के बाहर मल्टीलेवल पार्किंग विकसित की जाएगी, जहां से विशेष बसों के जरिए श्रद्धालुओं को मेला क्षेत्र तक पहुंचाया जाएगा। यह व्यवस्था पहली बार “पार्किंग टू पिलग्रिम ट्रांसपोर्ट” मॉडल के तहत लागू होगी, जिससे शहर के भीतर वाहनों की भीड़ को नियंत्रित किया जा सके।

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मेगावॉट बिजली आपूर्ति की तैयारी, उज्जैन में मेगा प्लान

सिंहस्थ के लिए बिजली की मेगा तैयारी

आगामी सिंहस्थ महापर्व को लेकर ऊर्जा विभाग ने निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशानुसार, मेला क्षेत्र में अनुमानित 230 मेगावॉट बिजली की मांग को पूरा करने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा विकसित किया जाएगा।

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झुकी हुई रीढ़ के प्रतीक के रूप में लोकतंत्र, चुनावी रैली, भीड़ और मंच पर खड़े नेता का व्यंग्यात्मक दृश्य

लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़

लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसकी रीढ़ भीड़ और दिखावे के बोझ तले झुकती नजर आती है। चुनावी रैलियाँ संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गई हैं, जहाँ नागरिकों को गिना जाता है, समझा नहीं जाता। जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकार नहीं, बल्कि चुनावी उपहार की तरह परोसी जा रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में मतदाता धीरे-धीरे ग्राहक में बदलता जा रहा है। फिर भी उम्मीद कायम है जब जनता सवाल पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़ फिर से सीधी होने लगती है।

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खुली किताब से निकलती रोशनी और भावनाओं का संसार, साहित्य की शक्ति को दर्शाता दृश्य

किताबों की खुशबू

किताबों की खुशबू में एक ऐसा संसार बसता है, जहाँ शब्द नहीं, भावनाएँ बोलती हैं। साहित्य केवल अक्षरों का मेल नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज़ है, जो हर युग में मन को छूती है। यह कभी भक्ति, कभी सत्य, तो कभी प्रेम और जीवन की गहराई बनकर हमारे भीतर उतरता है। अंधेरों में यही एक दीप बनकर राह दिखाता है और उलझनों में उत्तर बनकर सामने आता है। इसलिए किताबों से जुड़ना, दरअसल खुद से जुड़ना है क्योंकि साहित्य ही हमें इंसान बनने का सच्चा अर्थ सिखाता है।

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कवयित्री सुरभि डागर का रचनात्मक चित्र

सुरभि डागर : सादगी, संवेदना और सृजन का सुंदर संगम

रभि डागर समकालीन हिंदी साहित्य की उन रचनाकारों में हैं, जिनकी लेखनी संवेदनाओं को शक्ति में बदलने की क्षमता रखती है। उनकी रचनाएँ जीवन की सच्चाई, रिश्तों की ऊष्मा और स्त्री-मन की कोमलता को बेहद सहजता से अभिव्यक्त करती हैं। वे अपने आसपास घटित घटनाओं को केवल देखती नहीं, बल्कि उन्हें गहराई से महसूस कर शब्दों में ढाल देती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ बनावटी नहीं, बल्कि जीवन का सजीव प्रतिबिंब प्रतीत होती हैं।

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संघर्ष से सफलता की ओर बढ़ता व्यक्ति, अंधेरे से उजाले की तरफ जाते हुए, उगते सूरज का दृश्य

ठोकरों से ताज तक

यह ग़ज़ल एक साधारण व्यक्ति के भीतर छिपी असाधारण संभावना की कहानी है, जहाँ संघर्ष, आत्मविश्वास और उम्मीद एक साथ चलते हैं। कवि मानता है कि अभी भले ही वह “ख़ाक” है, पर उसी मिट्टी से एक दिन उसका “चाँद” उभरेगा .यही सच्ची जीवन प्रेरणा है। दुनिया भले उसे कमतर आँके, लेकिन उसका विश्वास अडिग है कि मेहनत और सब्र से वह खुद को निखारेगा। हर ठोकर उसे गिराने के बजाय आगे बढ़ने की ताकत देती है, जो अंततः सफलता की ओर ले जाती है।

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अहंकार में डूबा व्यक्ति, चारों ओर धूल और धुंध, पीछे जलती हुई बगिया और प्रतीकात्मक अराजकता

आत्ममुग्धता

धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।

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महाभारत की सभा में द्रौपदी की करुण पुकार, भगवान कृष्ण द्वारा चीर रक्षा का दिव्य दृश्य

द्रौपदी की करुण पुकार

सभा के मध्य खड़ी द्रौपदी की आँखों में भय, अपमान और आक्रोश एक साथ उमड़ रहे थे। चारों ओर सत्ता के प्रतीक उपस्थित थे, पर न्याय कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शकुनि के छल से आरंभ हुआ यह खेल अब उसकी अस्मिता पर आकर ठहर गया था। दुर्योधन की क्रूर मुस्कान और दुःशासन की निर्दयता ने सभा को और भी भयावह बना दिया था।
भीष्म और धृतराष्ट्र जैसे महान भी मौन थे, मानो धर्म स्वयं बंधन में जकड़ा हो। उस असहाय क्षण में द्रौपदी के भीतर से केवल एक ही पुकार उठी—कृष्ण। उसने अपने समस्त अहंकार, भय और पीड़ा को त्यागकर स्वयं को पूर्णतः उस परम शक्ति के हवाले कर दिया। और तभी, जब मानवता ने साथ छोड़ दिया, आस्था ने उसका हाथ थाम लिया—अदृश्य होकर भी कृष्ण उसकी लाज की रक्षा के लिए उपस्थित हो गए।

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कृष्ण और कृष्ण प्रिया

वह स्वयं को हर रूप में देखता है वामन, नरसिंह, माधव, नंदलाल एक ही सत्ता, अनेक लीलाएँ। और उसके सामने खड़ी है ‘कृष्ण प्रिया’, जिसकी पहचान केवल उसकी भक्ति है। ग्वालिन के वेश में, आँखों में प्रेम और अधरों पर पुकार लिए, वह बस इतना चाहती है कि कृष्ण नाम में खो जाए। उसके लिए वही तिलक है, वही श्रृंगार, वही जीवन। अंत में उसकी एक ही विनती रह जाती है. “जब मैं कहूँ… आओ न स्वामी, तो तुम आ जाना।”

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