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डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ : शब्दों से जीवन संवारने वाली

साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि संवेदनाओं, संघर्षों और समाज को नई दिशा देने का माध्यम है। शिक्षिका, साहित्यकार और राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की संस्थापिका डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ ने अपनी लेखनी को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं बनाया, बल्कि इसे नई प्रतिभाओं को पहचान दिलाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का मिशन बनाया है। इस विशेष बातचीत में उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा, चुनौतियों, पुरस्कारों, डिजिटल युग में साहित्य की बदलती तस्वीर और युवा रचनाकारों के लिए अपने प्रेरक संदेश को बेहद आत्मीयता के साथ साझा किया है।”

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एक-दूजे में समाने की वह रात

हल्की बारिश, चाय की महक और प्रेम से भरी एक शांत शाम. राघव और रिद्धिमा के बीच शब्दों से परे एक ऐसा रिश्ता है, जहाँ विश्वास, अपनापन और आत्माओं का मिलन प्रेम को एक नए अर्थ में बदल देता है. यह कहानी दो दिलों की उस रात की दास्तान है, जब प्रेम कविता नहीं, बल्कि घर बन गया.

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युद्ध और उसके परिणामों पर चिंतन को दर्शाता एक प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें धुएँ और विनाश के बीच खड़ा एक अकेला व्यक्ति संघर्ष और मानवता पर विचार कर रहा है।

युद्ध की समझ…

युद्ध कोई नहीं चाहता, फिर भी इतिहास गवाह है कि कई बार परिस्थितियाँ और अन्याय ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँ संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। यह कविता युद्ध के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उसकी समझ विकसित करने का प्रयास है।

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द्ध और प्रदूषण के कारण उठता काला धुआँ, जो आसमान को ढकते हुए विनाश और पर्यावरण संकट का प्रतीक बन गया है।

मैं हूँ धुआँ…

यह कविता धुएँ को एक दैत्याकार शक्ति के रूप में चित्रित करती है, जो युद्ध, बम, मिसाइलों और आग से जन्म लेकर पूरे वातावरण को विषाक्त कर देना चाहती है। यह केवल प्रदूषण की नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आत्मविनाश की कहानी भी है।

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आँखों में आँसू लिए परिवार की तस्वीर पकड़े बैठे एक भारतीय पिता, जो पिता के प्रेम, त्याग और भावनाओं को दर्शाता है।

पिता लिखे नहीं जाते

हम अक्सर पिता को केवल एक मजबूत व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं, लेकिन उनके भीतर भी भावनाएँ, डर और थकान होती है। यह लेख एक बेटे के उस एहसास की कहानी है, जब उसने पहली बार अपने पिता को रोते हुए देखा।

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हरसिंगार: वह फूल जो गिरकर भी महकना नहीं छोड़ता |

हरसिंगार: वह फूल जो गिरकर भी महकना नहीं छोड़ता

रात में खिलने और सुबह धरती पर बिखर जाने वाला हरसिंगार केवल एक फूल नहीं, बल्कि जीवन का गहरा संदेश है। यह सिखाता है कि जीवन की सुंदरता उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसके द्वारा छोड़ी गई खुशबू और प्रभाव में होती है।

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अंबुबाची मेला 2026: शक्ति, प्रकृति और नारी सम्मान का अद्भुत उत्सव

अंबुबाची मेला: शक्ति, प्रकृति और आस्था का संगम

जब देवी कामाख्या होती हैं रजस्वला : कामाख्या मंदिर की अनोखी परंपरा रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) भारत की सांस्कृतिक विविधता में अनेक ऐसे पर्व और मेले हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण दुनिया भर का ध्यान आकर्षित करते हैं। असम के गुवाहाटी स्थित पवित्र कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला ऐसा…

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An elderly Indian father caring for his sick wife in a dimly lit room, reflecting loneliness, sacrifice, and the struggles of old age.

पिता की पीड़ा

वर्तमान पिता” एक मार्मिक कविता है, जो उस पिता की कहानी कहती है जिसने अपना पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन बुढ़ापे में उपेक्षा, अकेलेपन और स्वार्थपूर्ण रिश्तों का सामना कर रहा है। यह कविता बदलते पारिवारिक मूल्यों और माता-पिता के प्रति संवेदनशील होने का संदेश देती है।

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A diverse group of Indian people, including children, adults, and senior citizens, practicing yoga together in a green park at sunrise, promoting health, wellness, and community spirit.

योग करो, स्वस्थ रहो

योग करो, स्वस्थ रहो” एक प्रेरणादायक कविता है जो योग के महत्व, स्वस्थ जीवन, मानसिक शांति और निरोग भारत के संदेश को सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह कविता सभी को दैनिक जीवन में योग अपनाने और स्वस्थ समाज के निर्माण का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करती है।

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सीता चाहिए, तो राम भी बनो

यह कविता समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, एसिड अटैक, महिलाओं के प्रति हिंसा और दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रश्न उठाती है। साथ ही यह पुरुषों को राम और कृष्ण जैसे आदर्शों का अनुसरण कर नारी सम्मान की रक्षा करने का संदेश देती है।

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