श्रीदेवी चश्मे में

मोबाइल और वीडियो गेम से पहले हमारा बचपन माचिस की छापों और फिल्मी पोस्टरों में बसा था। छाप खेलते हुए रेल पटरियों पर खज़ाना ढूँढना, रेयर माचिस पर रौब दिखाना और फिर ताश जैसे पत्तों में दांव लगाना“श्रीदेवी चश्मे में!”ये सिर्फ़ शब्द नहीं, पूरे दौर की धड़कन थे। वह खेल बिना पैसों का था, पर यादों से भरपूर।

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आत्मविश्वास से खड़ा व्यक्ति, चुनौतियों के बीच सफलता की ओर बढ़ता हुआ

“जिद से पहचान”

बदनाम से पहचान तक” एक गहरी भावनात्मक हिंदी ग़ज़ल है, जो इंसान के संघर्ष, आत्मसम्मान और समाज की बदलती सोच को दर्शाती है। यह ग़ज़ल बताती है कि जीवन में बदनामी या असफलता अंत नहीं होती, बल्कि वही हमारे लिए एक नई पहचान बनाने का अवसर बनती है। आज के दौर में जब लोग अक्सर दूसरों के बारे में जल्दी राय बना लेते हैं, यह रचना हमें धैर्य, मेहनत और आत्मविश्वास का महत्व सिखाती है।

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सिगड़ी के पास सिमटी यादें

सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।

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दूसरों पर टिकी खुशी, भीतर से टूटता मन

जब खुशियाँ दूसरों पर निर्भर हो जाती हैं, तब टूटना तय होता है। यह लेख बाहरी और आंतरिक खुशी के फर्क को समझाते हुए आत्मनिर्भर, स्थिर और सच्ची खुशी की ओर ले जाने वाला भावनात्मक आत्मचिंतन है।

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बारिश भरी रात में खिड़की के पास बैठा एक उदास व्यक्ति, जो मोहब्बत की यादों में खोया हुआ है।

दर्द-ए-मोहब्बत

यह भावपूर्ण ग़ज़ल मोहब्बत में बिछड़ने के बाद दिल में उठने वाली तन्हाई, टूटन और यादों के दर्द को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है। हर शेर दिल की गहराइयों को छू जाता है

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सागर सा वजूद

समुद्र की तरह व्यापक है हमारा वजूद, बस ज़रूरत है उसमें छिपे मोतियों को पहचानने की। जिसकी तलाश में हम दुनिया भर भटकते हैं, वह ख़ुद हमारे भीतर ही छिपा होता है सुकून भी, ख़ुदा भी। भटकते-भागते जीवन में कभी-कभी घर लौटकर देखना चाहिए, शायद वही ठहराव का असली स्थान हो। मन उदास हो तो आकाश की तरफ देखो—वही विशालता दिल को हल्का कर देती है। हार से पहले हार मत मानो; अवसर लौट-लौट कर आते हैं।

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पुश्तैनी घर

पुश्तैनी घर ईंट-पत्थर नहीं होते, वे पीढ़ियों की साँसें सँजोए रहते हैं। उनकी दीवारों में हँसी की गूँज, डाँट की तपिश और रिश्तों की गर्माहट कैद रहती है। जब हम उन्हें छोड़ देते हैं, वे धीरे-धीरे खंडहर नहीं, मौन पीड़ा में बदलते हैं जीते-जी मरते हुए।

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चिड़िया-सी उड़ान

मैं फिर से बच्ची बनना चाहती हूँ — बिना डर, बिना संकोच। खुलकर हँसना-रोना, बारिश में भीगना और सिर्फ माँ-पापा के दुलार में खो जाना। दुनिया की सोच से परे, कुछ पल के लिए सिर्फ अपने होने को जीना चाहती हूँ।”

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महिदपुर रोड में गुरु सप्तमी महापर्व की रहेगी धूम

महिदपुर रोड स्थित श्री स्थानीय सुविधिनाथ जैन मंदिर में गुरु सप्तमी महापर्व के अवसर पर प्रभात फेरी, भक्तांबर पाठ, गुरु इक्कीसा, गुरुपद महापूजन, महाआरती एवं भक्ति संध्या सहित विविध धार्मिक आयोजनों का भव्य आयोजन किया जाएगा। इसमें महिला मंडल, बहु मंडल की सक्रिय सहभागिता रहेगी।

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