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उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के दौरान शिप्रा नदी के घाटों का निरीक्षण करते साधु-संत और अधिकारी 📝 Social Media Caption

सिंहस्थ-2028 की तैयारी पर संतों की मुहर

प्रशासन की रफ्तार पर जताया भरोसा उज्जैन. सिंहस्थ 2028 की तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे साधु-संतों ने प्रशासन के कामकाज पर संतोष जताया और घाट निर्माण की तेज गति की सराहना की. हालांकि इस निरीक्षण के दौरान शैव अखाड़ों के संतों की अनुपस्थिति ने नई चर्चा को जन्म दिया. गुरुवार को वैष्णव अखाड़ों से जुड़े…

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विरह की चुप्पी…

विरह की चुप्पी केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है, बल्कि जीवन की गहराई का रूपक है। ऊँचे टीले पर बैठी नायिका सादगी और मासूमियत की प्रतिमा है—उसकी आँखों में टूटी हुई आकांक्षाएँ और मौन में दबे सपने हैं। उसके पास खड़ा सूखा वृक्ष, जैसे उसके मन के उजड़े आँगन का साक्षी हो। और उसी वृक्ष की डाली पर बैठी अकेली चिड़िया, उसकी पीड़ा को गीत में बदल देती है।

पवन उससे प्रश्न करता है—“किसका नाम लिए खोई हो?” लेकिन उत्तर शब्दों में नहीं, आँसुओं में टपकता है। यह मौन, यह अधूरापन, उसी विरह का संगीत है।फिर भी यह कविता केवल दुख का चित्र नहीं है। चिड़िया की तान हमें बताती है कि हर पतझड़ के पीछे छुपी होती है नयी हरियाली, हर सूखेपन के पार होती है नवजीवन की आहट।

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प्रेम और विश्वास को दर्शाती हिंदी कविता – तुम राज़दां हो मेरी

मनमीत

तुम मेरे जीवन का वह विश्वास हो, जो अँधेरों में भी राह दिखाता है। जब संसार डगमगाता है, तब तुम्हारी मौजूदगी मुझे स्थिर रखती है। यह साथ किसी वचन या शपथ से बड़ा है. यह आत्मा की स्वीकृति है, जहाँ भय का कोई स्थान नहीं। तुम्हारे इश्क़ में मुझे सुकून मिला है, ऐसा सुकून जो प्रश्न नहीं करता, केवल स्वीकार करता है। हम दो शरीर नहीं, एक ही चेतना के विस्तार हैं तुम मेरी साधना हो और मैं तुम्हारी आस्था। इसी निष्कपट प्रेम में जीवन की हर कठिनाई सहज हो जाती है, और हर पथ आलोकित।

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दौड़

**Blurb:**

कहानी *“रेस”* आधुनिक प्रकाशन जगत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ प्रतिभा नहीं, नाम बिकता है। एक साधारण लेखिका की शानदार कहानी केवल इसलिए अस्वीकृत कर दी जाती है क्योंकि उसके पास कोई पहचान नहीं। संपादक के लिए रचनाएँ नहीं, “ब्रांड” मायने रखते हैं। सहायक आलोक के भीतर उठता द्वंद्व और अंत में उसकी मजबूर चुप्पी – यही इस कहानी का दर्द है। यह सिर्फ एक दफ्तर का दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की झलक है जहाँ शब्दों की जगह प्रसिद्धि का शोर गूँजता है।

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सबसे बड़ा है कौन

सत्ता ,संगठन और राजनेता राजनीति की मुख्य धुरी हैं। कहा जाता है कि अगर इनमें तालमेल है तो सब कुछ ठीक नजर आता है मगर कभी कभी इनमें वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाती है और फिर यह तयः करना मुश्किल होता है कि इन तीनों में से कौन बड़ा है ,सर्वश्रेष्ठ है या किसकी चलती है या किसकी सुनी जा रही है। देखा जाए तो संगठन ही सबसे बड़ा होता है क्योंकि संगठन ही सबको जोड़कर रखता है और संगठन के नीचे ही सब काम करते हैं और संगठन ही निर्णय करता है कि कौन चुनाव लड़ेगा और जीतकर सत्ता में जायेगा और कौन संगठन में काम करेगा। संगठन ही तयः करता है कि कौन राजा बनेगा और कौन मंत्री । इसलिए संगठन और संगठन का मुखिया ही बड़ा होता है। संगठन से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले चारों खाने चित ही दिखाई दिए हैं।

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सूर्योदय की सुनहरी रोशनी में एक भारतीय माँ अपने वयस्क बच्चे के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखे खड़ी है। दोनों के चेहरे पर प्रेम, सम्मान और आत्मीयता झलक रही है। पृष्ठभूमि में हरे-भरे खेत, खिले हुए फूल और शांत आकाश दिखाई दे रहे हैं, जो मातृत्व, त्याग, संरक्षण और जीवन की प्रेरणा का प्रतीक हैं।

ममता सागर

माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, प्रेरणा और समर्पण का जीवंत स्वरूप है। यह भावपूर्ण कविता ईश्वर के सबसे अनमोल उपहार “माँ” के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करती है।

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देह की देहरी से परे

ह की देहरी लांघकर तुम कभी मुझ तक नहीं आ पाओगे। मैं केवल बाहर से दिखाई देने वाला शरीर नहीं हूँ, मैं सिर से पाँव तक, बाहर से भीतर तक सम्पूर्ण हृदयवत हूँ। इस शरीर के खोल की दीवारें मैंने कछुए जैसी मजबूत बनाई हैं। यह बदन भोग्य नहीं, यह एक मंदिर है, जिसमें मैंने स्वयं की प्रतिमा स्थापित की है और उस द्वार की प्रहरी मैं स्वयं हूँ।

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महिदपुर रोड की बहू बनी हाईकोर्ट एडवोकेट, चुनौतियों को हराकर लिखी सफलता की कहानी

महिदपुर रोड की खुशबू सिद्धार्थ कोचर ने साहस और मेहनत से हाईकोर्ट एडवोकेट बनने का सपना पूरा किया. उनकी यह कहानी महिलाओं के लिए प्रेरणा है.

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लोभ जीवन में विनाश लाता है : डॉ. अमृतरसा श्रीजी

महिदपुर रोड के श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के दौरान साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी महाराज ने धर्मसभा में लोभ को सबसे खतरनाक कषाय बताते हुए कहा कि लोभ व्यक्ति को दुर्गति, विनाश और पतन की ओर ले जाता है. इस अवसर पर 51 से अधिक सिद्धितप तपस्वियों की तपस्या जारी है और 20 अगस्त से नवकार महामंत्र आराधना का शुभारंभ होगा.

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टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

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